Detailed sequence of worship -Step by Step with Mantras and Six enemies of the mind ( Shadripu)





English

Those who are truly interested in learning about the method of worship should read Srimad Bhagavatam, Canto 11, Chapter 27. This chapter explains in detail how a devotee should properly worship the Lord in His deity form with faith, purity, and devotion. It describes the necessary qualifications, rituals involving bathing, chanting, offering water, flowers, food, and sacred items, and the importance of sincere devotional feeling beyond mere external opulence.

Hindi

जो लोग वास्तव में पूजा की विधि जानने में रुचि रखते हैं, उन्हें श्रीमद् भागवतम् के स्कंध  11, अध्याय 27 को पढ़ना चाहिए। इस अध्याय में विस्तार से बताया गया है कि एक भक्त को विश्वास, शुद्धता और भक्ति के साथ भगवान की प्रतिमा की पूजा कैसे करनी चाहिए। इसमें आवश्यक योग्यताओं, स्नान, मंत्र जप, जल, फूल, भोजन और पवित्र वस्तुओं के अर्पण की विधियों, और केवल बाहरी वैभव से ऊपर सच्चे भक्तिपूर्ण भाव की महत्ता को समझाया गया है।


विस्तृत पूजा-क्रम (Step by Step with Mantras)

1. ॐ नमो नारायणाय। ॐ श्री परब्रह्मणे नमः

2. आचमनम् (Ācamana – purification with water)

तीन बार जल ग्रहण करते हुए –

ॐ केशवाय स्वाहा।  

ॐ नारायणाय स्वाहा।  

ॐ माधवाय स्वाहा॥

3. सङ्कल्पः (Saṅkalpa – Resolution of Worship)

दक्षिणहस्ते जल लेकर –

ममोपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा  

श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं  

अहं (अमुक-देवता) पूजनं करिष्ये॥

4. आसन-समर्पणम् (Offering Seat to Deity)

ॐ आसनं समर्पयामि॥

5. आवाहनम् (Invocation of Deity)

(आपके आवाहन मंत्रों के अनुसार)

ॐ श्रीजगन्नाथाय नमः। ॐ श्रीजगन्नाथं आवाहयामि।  

ॐ श्रीबलभद्राय नमः। ॐ श्रीबलभद्रं आवाहयामि।  

ॐ श्रीप्रद्युम्नाय नमः। ॐ श्रीप्रद्युम्नं आवाहयामि।  

ॐ श्रीअनिरुद्धाय नमः। ॐ श्रीअनिरुद्धं आवाहयामि।  

ॐ श्रीनारायणाय नमः। ॐ श्रीनारायणं आवाहयामि।  

ॐ श्रीअनन्तशेषाय नमः। ॐ श्रीअनन्तशेषं आवाहयामि।  

ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः। ॐ श्रीमहालक्ष्मीम् आवाहयामि।  

ॐ श्रीनारायण्यै नमः। ॐ श्रीनारायणीम् आवाहयामि।  

ॐ सर्वसृष्टिकर्त्रे नमः। ॐ सर्वसृष्टिकर्तारं आवाहयामि।  

ॐ परमात्मने नमः। ॐ परमात्मानम् आवाहयामि।  

ॐ परमात्मिकायै नमः। ॐ परमात्मिकाम् आवाहयामि।  

ॐ प्रकृत्यै नमः। ॐ प्रकृतिम् आवाहयामि।  

ॐ सर्वसृष्टये नमः। ॐ सर्वसृष्टिं आवाहयामि॥

6. पाद्य-समर्पण (Washing Feet)

ॐ पाद्यं समर्पयामि॥

7. अर्घ्य-समर्पण (Offering Water)

ॐ अर्घ्यं समर्पयामि॥

8. आचमन-समर्पण (Sipping Water for Purification)

ॐ आचमनीयं समर्पयामि॥

9. स्नानम् (Bathing / Abhiṣeka)

ॐ स्नानं समर्पयामि॥

10. वस्त्र-आभरण-समर्पण (Offering Clothes and Ornaments)

ॐ वस्त्रं समर्पयामि॥  

ॐ आभरणानि समर्पयामि॥

11. गन्ध-समर्पण (Sandal Paste / Scents)

ॐ गन्धं समर्पयामि॥

12. पुष्प-समर्पण (Offering Flowers / Tulasi / Akṣata)

ॐ पुष्पाणि समर्पयामि॥

13. धूप-समर्पण (Offering Incense)

ॐ धूपं समर्पयामि॥

14. दीप-समर्पण (Offering Light)

ॐ दीपं दर्शयामि॥

15. नैवेद्य-समर्पण (Offering Food)

ॐ नैवेद्यं निवेदयामि॥

16. जल-समर्पण (Offering Water for Drinking)

ॐ जलं समर्पयामि॥

17. ताम्बूल-समर्पण (Offering Betel Leaves, Fruits, Dakṣiṇā)

ॐ ताम्बूलं समर्पयामि॥

18. आरती (Light-Waving Ceremony)

दीपक घुमाते हुए देवता की स्तुति करें।

उदाहरणात्:

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे॥

भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

19. स्तोत्र-पठन/भजन (Recitation of Hymns / Chanting)

श्रीजगन्नाथ स्तोत्र, भगवद्गीता के श्लोक या भक्तिपरक भजन।

20. क्षमा-प्रार्थना (Seeking Forgiveness)

अपराधसहस्राणि कृतानि मया प्रभो।  

दासोऽयं इति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥

21. प्रदक्षिणा-नमस्कार (Circumambulation and Salutation)

ॐ प्रदक्षिणं नमस्कारं समर्पयामि॥

22. विसर्जनम् (Conclusion – Farewell to Deity)

ॐ यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मेऽद्भुताः।  

आशिर्वादं प्रदायैव गच्छन्तु स्वं निवासकम्॥ 

Six enemies of the mind ( Shadripu).

English & Hindi Version:-

Lust (Kama), Anger (Krodha), Greed (Lobha), Delusion (Moha), Pride (Mada), and Envy (Matsarya), are often considered the sources of human suffering. These are referred to as the "Shadripu" (six enemies of the mind), and they are seen as obstacles to spiritual growth and enlightenment. Here's a brief explanation of each:


1.Lust (Kama): Uncontrolled desire or longing, particularly for sensory pleasures. It can lead to attachment and dissatisfaction when not fulfilled.


2.Anger (Krodha): Intense displeasure or rage that arises when one's desires or ego are thwarted. It often clouds judgment and causes harm to others.


3.Greed (Lobha): An insatiable desire for material possessions, wealth, or power. Greed leads to discontent and selfishness, blinding a person from the needs of others.


4.Delusion (Moha): Confusion or ignorance, particularly of the true nature of reality. Moha represents the attachment to illusions or false understanding, leading one away from the path of wisdom.


5.Pride (Mada): An inflated sense of self-worth or arrogance. It results in self-centeredness, making one insensitive to others' needs and hindering spiritual humility.


6.Envy (Matsarya): Jealousy or resentment towards others for their success, achievements, or possessions. This vice causes unhappiness and can lead to negative actions towards others.


These vices are seen as barriers to inner peace and spiritual realization. The aim of most Indian spiritual traditions is to transcend base emotions, develop virtues like compassion, humility, and wisdom, and achieve spiritual realization (self-realization), ultimately leading to liberation (Moksha or Nirvana).


Hindi Version:

काम (कामना), क्रोध (क्रोध), लोभ (लोभ), मोह (मोह), मद (अहंकार), और मत्सर्य (ईर्ष्या) , ये मानव पीड़ा के प्रमुख कारण माने गए हैं और इन्हें "षड्रिपु" (मन के छह शत्रु) कहा गया है। ये सभी व्यक्ति के मन के शत्रु हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान की राह में बाधा डालते हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:


काम (कामना): इंद्रियों के सुखों के प्रति अनियंत्रित लालसा। यह तब तक असंतोष उत्पन्न करती है जब तक इच्छाएँ पूरी नहीं हो जातीं और व्यक्ति को बांधकर रखती है।


क्रोध (क्रोध): तीव्र गुस्सा या असंतोष, जो तब पैदा होता है जब किसी की इच्छाएँ या अहंकार बाधित होते हैं। यह व्यक्ति की विवेक शक्ति को धूमिल कर दूसरों को नुकसान पहुँचाने का कारण बन सकता है।


लोभ (लोभ): संपत्ति, धन, और शक्ति की असीमित चाह। लोभ से व्यक्ति में असंतोष और स्वार्थ की वृद्धि होती है, जिससे वह दूसरों की आवश्यकताओं की अवहेलना करने लगता है।


मोह (मोह): वास्तविकता के प्रति अज्ञानता या भ्रम। यह गलतफहमी या झूठे विचारों से लगाव पैदा करता है, जिससे व्यक्ति सच्चे ज्ञान से दूर हो जाता है।


मद (अहंकार): आत्म-गौरव या अहं की अतिशय भावना। यह व्यक्ति में आत्म-केंद्रितता को बढ़ाता है और उसे दूसरों की आवश्यकताओं से असंवेदनशील बना देता है, जिससे आध्यात्मिक विनम्रता में बाधा उत्पन्न होती है।


मत्सर्य (ईर्ष्या): दूसरों की सफलता, उपलब्धियों या संपत्ति के प्रति जलन या असंतोष। यह भाव व्यक्ति में नकारात्मकता उत्पन्न करता है और उसे गलत कार्यों की ओर प्रेरित कर सकता है।


ये सभी मनोविकार व्यक्ति के आंतरिक शांति और आध्यात्मिक विकास के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। भारतीय आध्यात्मिक परंपराएँ इन्हें पार कर करुणा, विनम्रता और ज्ञान जैसे गुणों को विकसित करने और आत्म-साक्षात्कार (स्व-प्राप्ति) तक पहुँचने पर जोर देती हैं, जो अंततः मोक्ष या निर्वाण का मार्ग है।

Knowledge Through Poetry (Especially in Sanskrit)

Poetry makes knowledge last. Verse is easy to remember and simple to transmit, even without writing. In the Sanskrit tradition, wisdom was preserved orally for centuries, carried faithfully through sound and memory. In Sanskrit especially, the power of sandhi allows sounds and meanings to unite within a single, flowing expression. Words do not stand isolated; they merge, resonate, and create a living current of meaning. Poetry enters the heart through rhythm and resonance. No script is required-the Sanskrit word itself, woven through sandhi, shines complete and self-contained. It can travel intact from one heart to another. Even in times of destruction, when manuscripts are lost and structures fall, poetry safeguards knowledge. Memory becomes the temple, sound becomes the scripture, and the living voice becomes the preserver of truth.

Thus, poetry is not merely ornamentation-it is a powerful vessel for holding, protecting, and disseminating knowledge across generations.

भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण संस्थितः।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स श्रीभगवान् स्मृतः॥

भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स हि कथ्यते श्रीभगवान्॥

भगवतत्त्वविवेचनम्

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण,

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्मेति कथ्यते भगवान्॥


यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् जगतः कारणं नियन्ता च,

स ईश्वरः स एव भगवान् परमब्रह्मादिदेवः सर्वेश्वरः॥

निराकार ब्रह्म-साकारब्रह्म साधना


अरूपं शान्तमदृश्यं, मनसोऽपि परं तत्त्वम्।

न रूपं न च नामास्ति, केवलं ब्रह्म नित्यम्॥ 


न दृश्येन्द्रियगोचरे, न तिष्ठति तत्र चित्तं।

चलति विषयमार्गेषु, छायास्वेव वारं वारं॥


कथं गृह्णात्यनन्तं, यः जानाति स्पर्शदृशा।

देहबद्धो हि जीवः, समीपं वाञ्छति सदा॥


तस्मात् सन्तो वदन्ति, सौम्यया वाचा पुनः।

रूपः सेतुर्भवेद् हृदि, भक्तेर्मार्गप्रदर्शकः॥


नामरूपे समारभ्य, चित्तं शान्तिं निगच्छति।

सेवया प्रेमयुक्त्या, तदेकत्वं प्रपद्यते॥ 


न केवलं शिलामात्रं, प्रतिमा भावसूचिका।

अरूपस्य प्रवेशाय, सा भवेदेव साधिका॥ 


रूपादारभ्य मार्गः, अरूपे परिणीयते।

भयसंशयविहीनः, आत्मा तत्रैव लीयते॥


तस्मात् रूपं समाश्रित्य, भावभक्तिं विवर्धय।

ततः शान्ते मनसि, ब्रह्मस्पर्शोऽनुभूयते॥ 

सत्यः

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा परं ब्रह्म भगवान् हि सत्यम्॥

सत्यः

यः स्वयं-संपूर्णः स्वयं-सिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा पूर्ण-ब्रह्म स एव भगवान् हि सत्यम्॥

श्रीअनन्तमाधव-नारायण

-नमस्कारस्तोत्रम्

ॐ श्री अनन्तमाधवाय नारायणाय 

वासुदेवाय शङ्कर्षणाय प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय

पद्मनाभाय पुरुषोत्तमाय विष्णवे नमः।

हरेर्मायानिवारणस्य साधनम्।

मनुष्यलोके हरेर्माया व्याप्ता सर्वत्र संस्थिता।

केवलं हरेः कृपादृष्ट्या परिहारः सम्भवः तस्याः॥


मोहिनी सा नयति एनं दुःखसंसारसागरम्।

हरेः स्मरणमात्रेण नश्यति सा स्वप्नसन्निभा॥

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जन्ममृत्युः (सत्यम्–मिथ्या)

(मुक्तछन्दः)

जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं पूर्णतया मिथ्या।

मरणानन्तरं सः जानाति लोकेऽस्मिन् सत्यम्॥


जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं केवलं स्वप्नम्।

मरणानन्तरं तत् भवति जाग्रतावस्थायां स्थितम्॥


तस्मात् जीवने सदा कर्तव्यं सदाचारं च सत्कर्म॥

अन्यथा मरणानन्तरं प्राप्नोति महद्दुःखकष्टम्॥

बालगोपालेन ईश्वरलाभः

(मुक्तछन्दः)

मानवो धर्मं कर्म च न जानन्नपि गृहे स्थापयति बालगोपालम्।

चिन्तयन्ति ते,बालगोपालस्य सेवया एव  प्राप्स्यन्तीति परं पदं।


धर्मं वदति वारं वारं,ईश्वरप्राप्तौ प्रथमं शुद्धं मनोऽवश्यकम्।

निष्कामं कर्म,निष्कामो धर्मो,भक्तिर्भक्तसम्मानश्च  प्रयोजनम्॥

बालगोपालेन ईश्वरलाभः

(मुक्तछन्दः)

मानवोऽजानन् धर्मं कर्म च गृहे स्थापयति बालगोपालम्।

चिन्तयन्ति ते, बालगोपालस्य सेवया एव प्राप्स्यन्ति परं पदम्।


धर्मं वदति वारं वारम्, ईश्वरप्राप्तौ शुद्धं मनः प्रथमम् आवश्यकम्।

निष्कामं कर्म, निष्कामो धर्मः,भक्तिः भक्तसम्मानश्च परमं साधनम्॥

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भक्त–भगवान्–भावः

भक्तः महाभावग्राही, भगवान् च तथैव सदा।

प्रेमसम्बन्धो महाभावः, स एव तयोः सदा॥

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सनातनधर्मस्य प्रथमः सोपानः

(The First Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं सत्पुरुषो भव, ततः सर्वकर्माण्याचर।

कामक्रोधलोभवर्जितः, दयामार्गे सदा स्थितः॥


हत्याहिंसाविनिर्मुक्तः, धर्ममार्गे दृढस्थितः।

लोकहिते सदा युक्तः, सत्ये नित्यं प्रतिष्ठितः॥


दयाशीलसमायुक्तः, न्यायमार्गे व्यवस्थितः।

एषः सनातनधर्मस्य, प्रथमः सोपानः स्मृतः॥

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सनातनधर्मस्य द्वितीयः सोपानः

(The Second Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं निष्कामकर्म स्यात्, द्वितीयं तत्त्वज्ञानार्जनम्।

तृतीयो भक्तियोगश्च, चतुर्थं आत्मप्रकाशकम्॥


कर्मयोगेन चित्तशुद्धिः, ज्ञानयोगेन ज्ञानार्जनम्।

भक्तियोगेन भक्तिप्राप्तिः, जीवहिते श्रेष्ठा गतिः॥


सर्वे मार्गाः लक्ष्यन्ते, लभ्यते मोक्षः स्यात्।

एषः सनातनधर्मस्य, द्वितीयः सोपानः स्मृतः॥

कर्मधर्मद्विपक्षेण जीवस्य गतिः

[ईश्वरप्राप्त्युपायः]

(मुक्तछन्दः)


यथा पक्षी द्वाभ्यां पक्षाभ्यां गच्छत्यन्यं स्थलम्।

तद्वज्जीवः कर्मधर्माभ्यां गच्छत्यन्यं जीवनपथम्॥


यथा ज्ञानबलात् पक्षी दृढविश्वाससंयुतः।

प्राप्नोति स्वप्रियं स्थानं निश्चलधिया युतः॥


तथा जीवः निष्कामकर्मधर्मपरायणः।

ज्ञानयोगेन संयुक्तः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः॥


प्रेमभक्त्यानुसेवया प्राप्नोति परमं पदम्।

परमानन्दमाप्नोति ईश्वरस्य दिव्यं धाम॥

स्वप्न-मरण-आत्मतत्त्वम्

(मुक्तछन्दः)


यदा निर्गच्छत्यात्मा देहात् न कश्चिद् वेद तदा।

न कम्पः नापि चिह्नः स्यात् शान्ते देहे स्थिते सदा॥


निशब्दं याति दूरं स यत्र प्राणो न गच्छति।

अदृष्टोऽज्ञातमार्गेण मृत्यु-पन्थानमृच्छति॥


पुनर्यदा प्रविशत्येष देहं मृत्तिकामयं पुनः।

तदा वेदना समुत्पन्ना चेतना जायते निश्चितः॥


स्पन्दते जागरूकं देहं जीवनं स्वं प्रपद्यते।

वेदना सूचयत्येव आत्मनः सन्निधिं ध्रुवम्॥


अतः मूढमिदं मनो न सर्वं सत्यमीक्षते।

स्वप्नमायाविलासेन भ्रान्तिमेव प्रसूयते॥


विवेकेन विचिन्त्यैतत् सत्यं मिथ्यां च भेदय।

क्षणभङ्गुरेऽस्मिन् लोके आत्मयात्रां निरीक्षय॥

सत्यस्य मौनम् 

(पृथिव्याः यथार्थता)

(मुक्तछन्दः)


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, न कश्चित् सत्यमिच्छति।

सर्वे वक्तुमिच्छन्ति, स्वकथां स्वनाम च॥


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, सर्वे मानगर्विताः।

स्वार्थे मग्नाः जनाः सर्वे, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


आपदि सम्प्राप्तायां तु, सत्यं ज्ञातुमिच्छन्ति।

पूर्वं तु न कश्चिदेव, कदाचन तत्त्वं वेत्ति॥


सर्वे यशःप्रचारेण, स्वनाम विस्तारयन्ति।

सत्यं तु नाङ्गीकुर्वन्ति, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


सत्यं तिष्ठति मौनेन, गर्वेणावृतचेतसाम्।

एषा लोके कठोरेव, पृथिव्याः यथार्थता॥


यः शुद्धात्मा स एवैतत्, जन्मनैव वेत्ति हि।

अन्ये मोहान्धचेतसः, न जानन्ति एव हि॥ 

सत्योपासना
पूजायां नास्ति समयो, न घंटानिनदः आवश्यकः।
न मन्त्रजपो न बाह्यकृत्यं, भाव एव आवश्यकः॥ 

न पश्यति भगवान् द्रव्यं, न हेमावरणभूषणम्।
हृद्गूढभक्तिमेव पश्येत्, शुद्धमानसपूजनम्॥

 ब्रह्मतत्त्वं
ब्रह्मतत्त्वविहीनग्रन्थजीवगुरुवर्णनम्
(ब्रह्मतत्त्वमहिमा)
यस्य ग्रन्थे न विद्यते ब्रह्मतत्त्वं,
तत् शास्त्रं न भवति पूर्णसत्यम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वं,
स जीवः न जानाति पूर्णतत्त्वम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,
स न गुरुः न पण्डितः शास्त्रमतम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,
रुद्धमेव भवति तस्य मोक्षद्वारम्॥
अन्नब्रह्मतत्त्वश्लोकः
अन्नं ब्रह्मेति श्रुतिषु सनातनम्,
भोजनं यज्ञरूपमुदाहृतम्॥
शुद्धे मनसि यत्र हि शुद्धमन्नम्,
तत्रैव वसति परं ब्रह्म नित्यम्॥

भक्त–भगवान्–भावः
भक्तः महाभावग्राही, भगवान् च तथैव सदा।
प्रेमसम्बन्धो महाभावः, स एव तयोः सदा॥
 सत्योपासना 
पूजायां नास्ति कालोऽत्र, न घंटानिनदः आवश्यकः।
न मन्त्रजपो न बाह्यक्रिया, भाव एव ह्यावश्यकः॥

न पश्यति भगवान् द्रव्यं, न हेमावरणभूषणम्।
हृद्गूढभक्तिमेव पश्येत्, शुद्धभावप्रपूजनम्॥ 
शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः
(मुक्तछन्दः)
शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं च आनन्दवर्धकम्।
अधर्मशोकभीतानां, तमसां च विनाशकम्॥

शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।
विष्णोः पूजाविधौ पुण्यं पापनाशनम् उत्तमम्॥

न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।
शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥
शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः
(मुक्तछन्दः)
शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं चानन्दवर्धकम्।
अधर्मशोकभीतानां तमसां च विनाशकम्॥

शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।
विष्णुपूजाविधौ पुण्यं पापनाशनमुत्तमम्॥

न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।
शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥
शङ्खनादमहिमा।
(मुक्तछन्दः)
उद्घोषोऽयं शङ्खनादस्य दैविको पुण्यवर्धनः।
नारायणस्य प्रीत्यर्थम् उद्घोषयेत् शङ्खनादम्॥

नास्ति धर्मे स्त्रीपुंसोर्भेदभावः कदाचन।
सर्वे समत्वभावेन कुर्वन्तु शङ्खनादम्॥
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मन्त्र–यज्ञ–पूजा–कथा

ब्रह्मणा आरम्भितो मन्त्रः
ब्रह्मणैव समापितः ।
स एव श्रेष्ठो मन्त्रः
सर्वमन्त्रेषु कीर्तितः ॥

ब्रह्मणा आरम्भितो यज्ञः
ब्रह्मणैव समापितः ।
स एव श्रेष्ठो यज्ञः
सर्वयज्ञेषु कीर्तितः ॥

ब्रह्मणा आरम्भिता पूजा
ब्रह्मणैव समापिता ।
सा एव श्रेष्ठा पूजा
सर्वपूजासु कीर्तिता ॥

ब्रह्मणा आरम्भिता कथा
ब्रह्मणैव समापिता ।
सा एव श्रेष्ठा कथा
सर्वकथासु कीर्तिता ॥

ब्रह्मणा= ब्रह्मन् + तृतीया एकवचन
ब्रह्मन्- अर्थः : परं ब्रह्म/परम ब्रह्म
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पूजा
यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।
सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥

पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्
जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।
परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि प्रथमम्॥

एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।
ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥

अज्ञानिनां मिथ्याप्रचारः
(ब्रह्मतत्त्वे अज्ञानम्)
अज्ञानी मूर्खा न जानन्ति श्रीबलभद्रम्।
श्रीशेषनागं बलभद्रनाम्ना कुर्वन्ति वर्णनम्॥

ते श्रीप्रद्युम्नं च श्रीअनिरुद्धं च न जानन्ति।
महाज्ञानी इति स्वयम् लोके प्रचारयन्ति॥

अज्ञानं ब्रह्मतत्त्वे, अज्ञानं सिद्धियोगशास्त्रे।
मिथ्याज्ञानं ते लोकेऽस्मिन् प्रचारयन्ति गुरुरूपे॥
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श्रीजगन्नाथ-बलभद्र-शेषनागतत्त्ववर्णनम्
जगन्नाथः परमब्रह्म आदिदेवः सनातनः।
बलभद्रः तस्य अंशः, जगन्नाथप्राणरूपः॥

शेषनागः अनन्तदेवः बलभद्रांशस्वरूपः।
विश्वभारधरणहारः आदिदेवः सनातनः॥

श्रीजगन्नाथतत्त्वप्रकाशः
(मुक्तछन्दः)
एकः ब्रह्म महाप्रभुः श्रीजगन्नाथः जगदीश्वरः॥
सर्वाधिकारः तस्यैव, नान्यः कश्चित् ईश्वरः॥

मा कुरुत अन्यायं, मा कुरुत अनधिकारकर्म।
अनधिकारिणः सर्वे लभन्ते धर्मतः दण्डम्॥

अहङ्कारो न रोचते, न रोचते बलदर्पणम्।
विनयः प्रीतिकर्ता स्यात्, तदेव ईश्वराभिलषितम्॥

सर्वेश्वरं महाप्रभुं श्रीजगन्नाथं  भक्तवत्सलम्॥
स्वांशैः सह महाप्रभुः करोति जगतः सञ्चालनम्॥

भक्तानुग्रहकर्ता सः लीलया धृतवान् मनुष्यताम्।
लोकहितार्थमुद्दिश्य दर्शयति अद्भुतं चरितम्॥
भक्तवत्सलत्वम्
नाहं स्वतन्त्रः अत्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु मे स्थिता प्रीतिः, ते मे सदा प्राणसमाः ॥

अहम् अस्वतन्त्रः नित्यं, भक्तपराधीन एव च।
स्नेहबन्धेन बद्धोऽस्मि, प्रेम्णा परिकर्षितः॥

न मे स्वार्थः कदाचित् स्यात्, भक्तानां तु सुखं मम।
तेषां विनाशे दुःखं मे, तेषां हर्षे सुखं मम॥

यथा जननी पुत्रे स्वप्राणान् अपि अर्पयेत्।
तथाहं स्वात्मानं भक्तजनाय ददाम्यहम्॥
भक्तवत्सल्य-स्तोत्रम् (2)
नाहं स्वतन्त्र एवात्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु स्थिता मम प्रीति, ते मम प्राणसखा परमः॥

ये भक्ताः शरणं यान्ति, तेषां रक्षां करोम्यहम्।
नाहं जहामि तान् भक्तान्, मयि ते नित्यशरणम्॥
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यज्ञाग्निप्रज्वलनम्
यज्ञेऽग्निप्रज्वलनार्थं घृतमेव प्रदीयते ।
मन्त्रपूतेन विधिना तत्कर्म समाचर्यते ॥

नात्यर्थं घृतमुत्सृजेत् नायथाक्रमतोऽचरेत् ।
शुद्धेन मनसा कर्म धर्ममार्गे प्रशस्यते ॥
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यज्ञयोगफलभेदः
यज्ञेन स्वर्गगुणधनवरलाभाः संपद्यन्ति स्वफलतः ।
न तु तेनैव लभ्येत् साक्षादीश्वरसन्निधिः फलतः ॥

योगाभ्यासेन दुःखनाशशान्तिचैतन्यवृद्धयः स्युः क्रमतः ।
भगवत्प्राप्तिरपि स्यात् भक्तिज्ञानसमन्वयतः ॥

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Lust, anger, greed, delusion – the mind’s great binding chain;

Envy, pride, and blinded folly – the soul’s relentless bane.

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षड्रिपुणां प्रभावः
(पतनोत्थानद्वयम्)
कामात् क्रोधो भवेद् मोहः, मोहाद् लोभोऽभिजायते।
लोभाद् मदो मत्सरश्च, पतनस्य क्रमः प्रवर्तते॥

दमात् शान्तिर्भवेद् बुद्धिः, बुद्धेर्धर्मोऽभिजायते।
धर्माद् विनयः प्रीतिश्च, उत्थानस्य क्रमः वर्तते॥
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मोक्षतत्त्वम्।
मुक्त -छन्दः (Devanagari)
येन तत्त्वेन जीवोऽयं प्राक् सृष्टो मूलकारणात् ।
तत् तत्त्वं ज्ञात्वा निर्लेपं मनः कृत्वा समर्पयेत् ॥
अधिष्ठाते समर्पे स्यात् स सत्यः शुद्धमोक्षदः ।
अनादिबन्धनच्छेदो विमुक्तिः परमं सुखम् ॥
सर्वेषां ऋणानां  परिशोधनमप्यावश्यकम् ॥
अनन्तो हरिः, अनन्ता हरिकथा,
अनन्तानि शास्त्राणि॥
(मुक्त छंद )
अनन्तो हरिरव्यक्तो लीलाश्चास्यानन्ताः।
शास्त्राण्यप्यनन्तानि कथाश्चास्यानन्ताः॥ 

अनन्तोऽस्य गुणो दिव्यो नास्ति तस्य परिसीमना।
न कश्चिज्जानाति पूर्णं तस्य दिव्यं चरितं नरजनाः॥

नादिर्न चान्तो यस्य प्रभोर्नित्यविभूतिषु।
अनन्तेऽस्मिन् हरेः कीर्तिः प्रवहत्येव मे चेतसि॥

निष्कामकर्मणा नित्यं निष्कामधर्मपालनात्।
लभ्यते स हरिः साक्षान्निष्कामभावनात्॥
अध्ययन-प्रचार-अध्यापन
अधिकारनीतिः
(मुक्तछन्दः)
सर्वेऽपि शास्त्रं पठितुं समर्हाः,
न जातिभेदो न च लिङ्गवर्जाः।
न जन्मना कश्चन वर्जनीयः,
सत्यस्य मार्गेऽधिकारयोग्यः॥

यो बोधयेद् अन्यजनं हि सम्यक्,
तस्यास्ति ज्ञानं यदि सुसम्यक्।
अज्ञानयुक्ता कथिता हि वाचः,
नयन्ति लोकान् विपथं भ्रंशम्॥

तस्मात् सनातनधर्मोऽयं ब्रूते,
न सर्व एवोपदिशन्ति शास्त्रे।
येषां तु ज्ञानं विशदं विमुक्तं,
ते एव लोकाय प्रदिशन्ति मार्गम्॥
शास्त्रार्थबोधयोग्यता
शास्त्रार्थबोधाय विवेकयुक्ता
सूक्ष्मा बुद्धिर्विज्ञानयुक्ता ।
युक्तिप्रधाना प्रबुद्धा बुद्धिः
तद्विना न सिद्ध्येत् गूढार्थगतिः॥
शास्त्राध्ययननीति।
गुरुपादाम्बुजयोगेन शास्त्रमध्येत न संशयः।
यथा प्रदीप्तदीपः तमो नाशयति तत्त्वतः॥
निहत्य मोहजालं गुरुः सत्यं तत्र न संशयः।
शास्त्रार्थसमीक्षया तेन मोक्षमार्गः प्रसस्तय॥ 
जीवस्य मनसः वचनम्
(जीवमनःकथा)
मुक्तछन्द
अहं जीवो भ्रमन् लोके कर्ममार्गेण चालितः।
न मे जातिर्न मे धर्मो न कुलं नापि निश्चितम्॥

जन्मजन्मान्तरं याति कर्मवायुवशानुगः।
नानारूपधरो जीवो नान्तमस्य गतौ लभेत्॥

कदाचित् मानवो भूत्वा नभः पश्यामि विस्मितः।
कदाचित् पशुरूपेण वृत्त्या तिष्ठामि वञ्चितः॥

पुनर्मानुषतां याति कालचक्रप्रवर्तितः।
नानारूपाणि धारयन् संसारार्णवे वर्तते॥

देशाद् देशं प्रव्रजामि न कश्चित् मे स्थिरं गृहम्।
अयं विश्वपथो दीर्घो न कदापि मम स्वगृहम्॥

कथं ब्रूयामहं गर्वात् “अयं धर्मो ममैकतः”?
यदा जीवाः सहस्रेषु पन्थान् यान्ति नानातः॥

यावत् सत्यं न पश्यामि जन्मबन्धविवर्जितम्।
न मे जातिर्न मे धर्मो न देशो न सुहृदः मम॥
जीवस्य अन्त्यप्रार्थना
(मुक्त छन्द)
मम शक्तिरियं क्षीणा, आशाप्यन्ते समाप्ता।
अन्ते सर्वं विनष्टं मे, नाथ त्वां शरणागतः॥

जन्मऋणं समाप्याहं त्वामहं ह्वये नाथम्।
कोले गृहाण मां दीनं, त्वं करुणामयः प्रभो॥

अस्मिन् लोके न कोऽप्यस्ति सत्यस्नेहपरायणः।
न कश्चिदिह जानाति प्रेम्णो मार्गमनन्तकम्॥

यत्र शुद्धः स्नेहभावो नित्यं मधुरसञ्चितः।
तत्र गन्तुमिहेच्छामि, नाथ त्वां शरणागतः॥

बहुदग्धोऽस्मि दुःखेन, कामजालात् विमुक्तः।
वैराग्येण दग्धचित्तः सर्वसङ्गविवर्जितः॥

बहु रुदितवान् पूर्वं, न शक्नोम्यद्य रोधनम्।
भिन्नहृदयोऽहमेकाकी, नाथ त्वां शरणागतः॥
हिंसादमनम्
अहिंसा परमो धर्मो हिंसा महापापम्।
हिंसाया दमनं धर्मः लोककल्याणकारणम्॥
पापनिवारणं श्रेष्ठधर्मः
पापिनः पापनिरोधो धर्म एव आवश्यकः।
पापकर्मणि दण्डदानं धर्मोऽप्यत्र आवश्यकः॥

पापस्य पूर्वबोधनं तद्वारणं च शास्त्रतः।
एष धर्मः परः प्रोक्तः सद्भिः सत्यपरायणैः॥
अधर्म-पापिपोषणदोषः 
(मुक्तछन्दः)
 पापिनं पालनं लोके निश्चयं पापमुच्यते।
 पापिनः संरक्षणं तु महापापं प्रचक्षते॥

 अधर्मस्य पालनं हि  पापं निगद्यते।
 अधर्मप्रोत्साहनं तु घोरं पापं प्रचक्षते॥
विवाहनीतिः
(मुक्त छंद)
एकविवाहः श्रेष्ठः स्यात् लोके धर्मपरायणः।
सुखदः शान्तिदः नित्यं जीवनस्य हितावहः॥ 

धर्मरक्षार्थमेवात्र बहुविवाहः कदाचन।
अन्यथा स दुःखदः स्यात् सदा क्लेशवृद्धिकरः॥

एकविवाहे सन्तोषः भार्यापत्यसमन्वितः।
शान्तिः प्रेम च नित्यं स्यात् हृदये सुखवर्धितः॥ 

बहूनामेकगृहस्थे विवादः स्यादनिवारितः।
कलहः क्लेशदः नित्यं जीवनं दुःखवर्धितम्॥ 

तस्मादेकविवाहोऽयं श्रेयस्करः बुधैः स्मृतः।
बहुविवाहो लोकेऽस्मिन् दुःखहेतुः प्रकीर्तितः॥
परस्त्री-कन्यालङ्घनदोषः
परस्त्रीगर्भधारणं महापापप्रदायकम्।
नियोगसंयोगप्रथा भ्रष्टाचारस्य कारणम्॥
कुमार्या सह सङ्गं तत् पापहेतुप्रदायकम्।
सृष्टेः संसारहेतूनां महाअहितकरं ध्रुवम्॥
💓
धर्मपूर्वकं प्रजननम्।
(मुक्तछन्दः)
प्रजननं सर्वभूतानां धर्मः शास्त्रोक्तम् अनुशासनम्।
पोषणसामर्थ्यं मनसि कृत्वा ततः कुर्यात् प्रजननम्॥
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योनिस्वयंवरनियमः
(प्रकृतिस्वयंवरसत्यं)
(मुक्तछन्दः)
प्रत्येकस्यां योनौ विद्यते स्वयमेव स्वयंवरसभा।
तत्र स्वयं प्रकाशते, ईश्वरदत्ता योनिप्रभा॥

एष प्रकृतेर्मूलं सत्यं परमः नियमः।
सर्वयुगेषु सर्वकाले सत्यरूपेण विद्यमानः॥

एष धर्मः प्रकृतेर्नित्यः स्वयंसिद्धः सनातनः।
सर्वकालेषु सत्योऽयं, न कदाचिद् विपर्ययः॥
प्रणामाशिषो नियमः
यः साष्टाङ्गं प्रणमति भक्त्या विनयान्वितः ।
तस्मै दातव्यमाशीर्वादं हृदयेन विशुद्धया ॥

यस्य शक्तिर्वर्तते तु आशीर्वादप्रदायने ।
स प्रयत्नेन दद्यात् तत् धर्ममार्गानुसारतः ॥

यदि शक्तिविहीनोऽपि दातुं न शक्नुयाद् जनः ।
तदा तत्प्रणतिं देवे समर्प्य प्रणतो भवेत् ॥

तस्य क्षेमं च कल्याणं प्रार्थयेत् श्रीहरिं प्रति ।
एष धर्मः सनातनः शाश्वतो नियमो ध्रुवः ॥
The Path of Worship of the Form 
and the Formless God
The Path of the Form and the Formless Divine
(Free Verse)

The Formless-silent, vast, unseen,
Beyond all thought, where none has been.
No color there, no shape, no name,
A boundless, ever-equal flame.

The mind that clings to sound and sight
Finds not its hold in endless Light.
It wanders still, by senses led,
Through paths where fleeting shadows spread.

How shall one grasp the Infinite,
Who knows the world by touch and sight?
The embodied soul, in nature tied,
Seeks something near, not vast and wide.

Thus the saint spoke with gentle art-
“Let form be the bridge for the heart.”
In image pure, in name divine,
The restless mind begins to align.

Through eyes that see, and hands that serve,
Through love that flows with steady nerve,
The finite bows to the Supreme,
And wakes at last from transient dream.

The idol is not stone alone,
But a step toward the Unseen Throne.
From form to formless, path is made,
Where fear dissolves and doubts all fade.

So worship Him in form you know,
Let love within you deeply grow-
For through that form, with heart made still,
You touch the One beyond all will.
As One Sees, So God Appears

When God on earth in human form did stay,
Yet few could see His truth in mortal clay.
Some hearts awoke and knew His form divine,
And felt His presence radiant, pure, sublime.

By His own word, His glory stood revealed,
And faith in Him within their souls was sealed.
They bowed in love, their vision clear and bright,
And sensed His fragrance filled with sacred light.

But others saw a man of common birth,
And mocked His name, unaware of worth.
Their clouded minds, in ignorance confined,
Perceived no grace, no truth their hearts could find.

Thus lives this tale upon the earthly span-
God seen as God, or merely seen as man.
As is the heart, so is the sight we frame:
One finds the truth, another mocks the same.
The sacred Texts
The Right to Read, Preach and Teach

All souls may read the sacred lore,
No caste or creed can bar that door.
No birth, no gender can deny,
The quest for truth that dwells on high.

Yet one who speaks and dares to guide,
Must hold true wisdom deep inside.
For words untrue, by ignorance spread,
Lead many minds by falsehood led.

Thus Sanātan Dharma makes it clear,
Not all who read should always steer;
But those with wisdom, pure and true,
May share the light for all to view.
When Religion Loses Its Sanctity

Just as a river, once deep and wide,
Turns into dust when its streams have died,
So too does faith, when truth departs,
Grow faint and hollow in human hearts.

When it loses divine laws, pure and free,
Its purity fades in silence-none can see.
When form remains but the soul is gone,
Its sacred light no longer shines on.

Rituals linger, but love and devotion fade,
Like shadows cast where light once played.
The words are spoken, the acts are done,
Yet lack the warmth of the inner sun.

For true religion is not mere name,
Nor rigid rule, nor outward claim;
Its life resides in the spirit’s flame,
In truth, in love-forever the same.

When essence lives, it shines so bright,
A guiding force, a path of light;
But drained of soul, it cannot remain-
A lifeless form, an empty frame.
The Reality of Life
(Divine Spell of Life)

God grants to every soul a span,
A silent gift, unseen by man.
Within the heart it softly lies,
A hidden flame that never dies.

Some use this spell to spread the light,
And kindle hope in darkest night.
While others wander, lost in chase,
Of fleeting dreams and empty race.

This spell is freedom, this is choice,
Bestowed on all with silent voice.
To shape one's path, to rise or fall,
The Divine entrusts this gift to all.

Yet when the spell draws near its end,
No wealth nor power can defend.
The body turns to dust again,
Released from time and mortal pain.

But deeds of truth, the seeds once sown,
Shall live when earthly breath has flown.
For life’s a sacred role we play,
Till time dissolves the fleeting day.
💓

Descent and Ascent of the Soul

(The Ladder of Fall and Rise)

From lust arises wrathful flame,

Delusion clouds the heart and aim.

Then greed and pride with envy blend,

Thus downward does the spirit descend.


From self-restraint springs peaceful bloom,

Clear mind dispels the inner gloom.

From righteousness flows humble grace,

And love uplifts the soul to its place

Language and Righteousness


Language is a tool where thoughts are shared,

To speak with love, with mindful care.

With words and rules, minds find a way,

To show what hearts would wish to say.


Yet righteousness needs no single tongue,

Its truth in every tongue is sung.

In every land, in voices free,

It lives in pure integrity.


No language blocks what’s right and true,

For duty shines in all that’s due.

Actions speak both loud and clear,

Their fruits will follow far and near.


So speak in words or silent stay,

Deeds alone will show the way.

For righteousness and actions prove,

The truth that lives, the life that moves.

💓

True Worship

For worship there is no time,

No need for bell or chant or chime;

God only sees devotion, not time-

A loving heart is truth sublime.


God does not see what you offer,

Nor judge the outer golden cover;

He only sees respect hidden in the wrapper,

The silent faith you gently offer.


No wealth nor grand display He sees,

No costly gifts or rituals please;

A humble heart bowed down in prayer

Brings the Lord to dwell and hear.


So worship not by hour or art,

But with a pure and faithful heart;

Where love and reverence shine in heart,

There begins true worship, devotion’s start.

💓

 Shadripu

(The Six Enemies of the Mind.)

Lust calls first, a fleeting flame,

Desires bloom yet end in shame.

Promises pleasure, endless chase,

But leaves the heart an empty space.


Then Anger strides, with fire in hand,

A tempest none can understand.

It blinds the mind, distorts the view,

Breaking bonds once pure and true.


Greed creeps close, with whispered lies,

More, it says, and never dies.

It fills the soul with endless need,

An aching void, a hollow greed.


Delusion drapes its veil so tight,

It twists the truth, obscures the light.

Wrapped in shadows of the mind,

Reality becomes confined.


Pride steps forth, a king in guise,

Raised above in haughty eyes.

Yet falls as swift as it ascends,

Leaving loss where once was friends.


And last, Envy, green and cold,

A jealous heart, a spirit sold.

It withers joy, it breeds disdain,

A bitterness that feeds on pain.


These six, the enemies we fight,

Hidden deep, yet plain in sight.

To conquer self, to rise above,

Is to embrace the path of love.


For when these shadows start to fade,

The spirit soars, no longer swayed.

The chains unbind, the heart set free

From six enemies of the mind, to tranquility.


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