Pitha‑Sthapana: Shastra, Guru, and Devotee.

In Sanatan Dharma, establishing a Piṭha requires adherence to Shastra, sacred land, proper rituals, an authorized Guru, and unbroken lineage. Beyond these essentials, it demands adhikara (spiritual qualification), nitya-aradhana (daily worship), ethical conduct, continuity of tradition, and lokasaṅgraha (welfare of the world). Ultimately, a Piṭha endures not merely through rituals, but through tapas (austerity), dharma, and living truth.

पीठनिर्माणसिद्धिः
(पीठनिर्माणविधिः)
शास्त्राधारे पवित्रे भूमौ विधिपूर्वं प्रतिष्ठितम् ।
अधिकारिगुरुणा सार्धं परम्परया सुपोषितम् ॥ 

नित्यआराधनसंयुक्तं सदाचारसमन्वितम् ।
लोकसंग्रहकार्येण शिष्यपरम्परान्वितम् ॥ 

न केवलं क्रियामात्रात् पीठं सिद्धिमवाप्नुयात् ।
तपोधर्मसमायुक्तं सत्येनैव विराजयेत् ॥
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Scripture and Shastra. 
Shastra = Texts that explain rules, principles, and true knowledge.
Dharma-Granthas = Texts that teach righteous conduct, devotion, and worship.
Shastra = Systematic knowledge + moral conduct & discipline.
Scripture = Sacred revelation + divine authority.

In summary, Scripture is a subset of Sastra distinguished by sacred revelation and divine authority, but Sastra is a broader category that includes any systematic body of knowledge or teaching in Sanatana Dharma.

Characteristics of a Guru.

According to the Veda, Gita, and Bhagavatam, a true Guru must possess scriptural mastery (Shastra-jna), adherence to an authentic lineage (Parampara), direct realization (Tattva-darshi / Brahma-nistha), and steadiness in Brahman (Bhagavan), along with self-control and inner purity, freedom from greed and ego, compassion, a peaceful and detached nature, and the ability to guide and instruct clearly. Scripture never says that birth makes a Guru, ashram makes a Guru, dress makes a Guru, or popularity makes a Guru. It is pertinent to mention here that if someone has scholarship but no realization, they are not complete; if they have realization but no shastric knowledge, they are not complete; and if they have knowledge, realization, but no purity, they are not complete- the scriptures demand all three.

Guru = Direct realization + Shastric knowledge + Purity


पूर्णगुरुः
शास्त्रज्ञानसमायुक्तो ब्रह्मतत्त्वविशारदः ।
साधनयोगसमन्वितो ब्रह्मसाक्षात्कृतिदः ॥

शुद्धान्तःकरणोपेतो निर्मलो विगतकल्मषः।
एवंलक्षणसम्पन्नः स एव पूर्णगुरुः स्मृतः॥
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Characteristics of a devotee.

A true devotee, regardless of their faith or spiritual tradition, typically displays the following characteristics:

1. Unwavering Faith

A true devotee has steadfast belief in their chosen deity, spiritual guide, or divine principle, even during challenges or hardships. Their faith remains unshaken by doubts or external circumstances.

2. Humility

They approach life with a humble attitude, acknowledging their dependence on a higher power. They do not seek recognition for their devotion and act selflessly.

3. Selfless Love

Their devotion is marked by unconditional love for the divine, expressed through acts of kindness, service, and compassion towards others.

4. Discipline in Practice

A true devotee consistently engages in spiritual practices such as prayer, meditation, chanting, or rituals. They prioritize their spiritual journey and integrate their practices into daily life.

महाज्ञानी महागुणी, यदि न भक्तो जनार्दने।
संसारचक्रबन्धोऽस्य, कर्मकाण्डेषु बध्यते॥
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भक्त–भगवान्–भावः
भक्तः महाभावग्राही, भगवान् च तथैव सदा।
प्रेमसम्बन्धो महाभावः, स एव तयोः सदा॥

5. Surrender to the Divine Will

They accept life's outcomes with grace, trusting in the divine plan. This surrender brings them peace, regardless of external challenges.

6. Purity of Heart

A true devotee strives to cultivate virtues such as honesty, forgiveness, patience, and inner purity. Their intentions are genuine, free from selfish motives.

7. Service-Oriented Attitude

They see serving others as a way to serve the divine. Acts of charity, community service, or helping those in need are natural expressions of their devotion.

8. Detachment

While they live in the world, a true devotee does not get overly attached to material possessions, status, or outcomes. Their focus remains on spiritual growth and the divine.

9. Inner Joy and Contentment

Their devotion brings a sense of peace and joy that does not depend on external conditions. They radiate positivity and inspire others.

10. Respect for All Life

A true devotee recognizes the divine presence in all beings and treats everyone with respect, love, and kindness.

11. The effort to remain close to God and His divine messengers, so that their sacred blessings may be attained.


भक्त के लक्षण।

1.अटूट श्रद्धा

सच्चे भक्त का अपने ईष्टदेव, गुरु या दिव्य सिद्धान्त में अटूट विश्वास होता है। कठिनाइयों या विपत्तियों के समय भी उनकी श्रद्धा डगमगाती नहीं।

2.विनम्रता

भक्त जीवन को नम्रता से जीता है। वह स्वयं को ईश्वर पर आश्रित मानता है और अपने भक्ति-कार्य के लिए प्रशंसा या पहचान नहीं चाहता।

3.निःस्वार्थ प्रेम

उसकी भक्ति निःस्वार्थ प्रेम से भरी होती है। यह प्रेम केवल ईश्वर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरों के प्रति दया, करुणा और सेवा में भी प्रकट होता है।

4.साधना में अनुशासन

सच्चा भक्त नियमित रूप से जप, ध्यान, प्रार्थना, कीर्तन या साधना करता है। वह अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिक साधना को प्राथमिकता देता है।

5.ईश्वर की इच्छा में समर्पण

भक्त हर परिणाम को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करता है। इस समर्पण से उसे हर परिस्थिति में शांति मिलती है।

6.हृदय की पवित्रता

भक्त का हृदय सदैव पवित्र होता है।  उसके भाव निःस्वार्थ और शुद्ध होते हैं।

7.सेवा-भावना

सच्चे भक्त के लिए  दान, परोपकार, सेवा और ज़रूरतमंदों की मदद करना उसकी भक्ति का स्वाभाविक रूप है।

8.वैराग्य

भक्त संसार में रहते हुए भी धन, पद या वस्तुओं से  आसक्त नहीं होता। उसका लक्ष्य  ईश्वर पर केन्द्रित रहता है।

9.अंतरंग शांति और प्रसन्नता

भक्ति से उसे ऐसा आनंद और संतोष मिलता है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होता। वह अपने भीतर की शांति से दूसरों को भी प्रेरित करता है।

10.सभी प्राणियों के प्रति आदर

सच्चा भक्त हर जीव में ईश्वर का अंश देखता है और सबके प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान का भाव रखता है।

11. ईश्वर-ईश्वरदूतसङ्गसन्निध्यम् :- ईश्वर और उनके दूतों के निकट रहने की चेष्टा, जिससे उनके पावन सान्निध्य की प्राप्ति हो सके।

Knowledge Through Poetry (Especially in Sanskrit)

Knowledge expressed in poetry endures. Verse is easy to remember and simple to transmit, even without writing. In the Sanskrit tradition, wisdom was preserved orally for centuries, carried faithfully through sound and memory.

In Sanskrit especially, the power of sandhi allows sounds and meanings to unite within a single, flowing expression. Words do not stand isolated; they merge, resonate, and create a living current of meaning.

Poetry enters the heart through rhythm and resonance. No script is required-the Sanskrit word itself, woven through sandhi, shines complete and self-contained. It can travel intact from one heart to another.

Even in times of destruction, when manuscripts are lost and structures fall, poetry safeguards knowledge. Memory becomes the temple, sound becomes the scripture, and the living voice becomes the preserver of truth.

Thus, poetry is not merely ornamentation-it is a powerful vessel for holding, protecting, and disseminating knowledge across generations.


भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण संस्थितः।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स श्रीभगवान् स्मृतः॥

भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स हि कथ्यते श्रीभगवान्॥

भगवतत्त्वविवेचनम्

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण,

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्मेति कथ्यते भगवान्॥


यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् जगतः कारणं नियन्ता च,

स ईश्वरः स एव भगवान् परमब्रह्मादिदेवः सर्वेश्वरः॥

निराकार ब्रह्म-साकारब्रह्म साधना

अरूपं शान्तमदृश्यं, मनसोऽपि परं तत्त्वम्।

न रूपं न च नामास्ति, केवलं ब्रह्म नित्यम्॥ 


न दृश्येन्द्रियगोचरे, न तिष्ठति तत्र चित्तं।

चलति विषयमार्गेषु, छायास्वेव वारं वारं॥


कथं गृह्णात्यनन्तं, यः जानाति स्पर्शदृशा।

देहबद्धो हि जीवः, समीपं वाञ्छति सदा॥


तस्मात् सन्तो वदन्ति, सौम्यया वाचा पुनः।

रूपः सेतुर्भवेद् हृदि, भक्तेर्मार्गप्रदर्शकः॥


नामरूपे समारभ्य, चित्तं शान्तिं निगच्छति।

सेवया प्रेमयुक्त्या, तदेकत्वं प्रपद्यते॥ 


न केवलं शिलामात्रं, प्रतिमा भावसूचिका।

अरूपस्य प्रवेशाय, सा भवेदेव साधिका॥ 


रूपादारभ्य मार्गः, अरूपे परिणीयते।

भयसंशयविहीनः, आत्मा तत्रैव लीयते॥


तस्मात् रूपं समाश्रित्य, भावभक्तिं विवर्धय।

ततः शान्ते मनसि, ब्रह्मस्पर्शोऽनुभूयते॥ 

सत्यः

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा परं ब्रह्म भगवान् हि सत्यम्॥

सत्यः

यः स्वयं-संपूर्णः स्वयं-सिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा पूर्ण-ब्रह्म स एव भगवान् हि सत्यम्॥

श्रीअनन्तमाधव-नारायण

-नमस्कारस्तोत्रम्

ॐ श्री अनन्तमाधवाय नारायणाय 

वासुदेवाय शङ्कर्षणाय प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय

पद्मनाभाय पुरुषोत्तमाय विष्णवे नमः।

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सनातनधर्मस्य प्रथमः सोपानः

(The First Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं सत्पुरुषो भव, ततः सर्वकर्माण्याचर।

कामक्रोधलोभवर्जितः, दयामार्गे सदा स्थितः॥


हत्याहिंसाविनिर्मुक्तः, धर्ममार्गे दृढस्थितः।

लोकहिते सदा युक्तः, सत्ये नित्यं प्रतिष्ठितः॥


दयाशीलसमायुक्तः, न्यायमार्गे व्यवस्थितः।

एषः सनातनधर्मस्य, प्रथमः सोपानः स्मृतः॥

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सनातनधर्मस्य द्वितीयः सोपानः

(The Second Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं निष्कामकर्म स्यात्, द्वितीयं तत्त्वज्ञानार्जनम्।

तृतीयो भक्तियोगश्च, चतुर्थं आत्मप्रकाशकम्॥


कर्मयोगेन चित्तशुद्धिः, ज्ञानयोगेन ज्ञानार्जनम्।

भक्तियोगेन भक्तिप्राप्तिः, जीवहिते श्रेष्ठा गतिः॥


सर्वे मार्गाः लक्ष्यन्ते, लभ्यते मोक्षः स्यात्।

एषः सनातनधर्मस्य, द्वितीयः सोपानः स्मृतः॥

कर्मधर्मद्विपक्षेण जीवस्य गतिः

[ईश्वरप्राप्त्युपायः]

(मुक्तछन्दः)


यथा पक्षी द्वाभ्यां पक्षाभ्यां गच्छत्यन्यं स्थलम्।

तद्वज्जीवः कर्मधर्माभ्यां गच्छत्यन्यं जीवनपथम्॥


यथा ज्ञानबलात् पक्षी दृढविश्वाससंयुतः।

प्राप्नोति स्वप्रियं स्थानं निश्चलधिया युतः॥


तथा जीवः निष्कामकर्मधर्मपरायणः।

ज्ञानयोगेन संयुक्तः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः॥


प्रेमभक्त्यानुसेवया प्राप्नोति परमं पदम्।

परमानन्दमाप्नोति ईश्वरस्य दिव्यं धाम॥

परमसत्योपदेशः

यः हरेः परमं रूपं तत्त्वतः विजानाति सः।

ये शरणं प्रपद्यन्ते ते पापेन न लिप्यन्ते ते॥


धर्मपुण्यादिभिर्मुक्ताः नित्ययुक्ता भवन्ति ते।

एतदेव वेदैः समाख्यातं परमं सत्यमुच्यते॥

ईश्वरप्राप्तेः सुलभोपायः

(सुतस्नेहे हरिभजनम्)

जीवः स्वसुतसन्ताने स्नेहं कुर्वन् स्वभावतः।

ईश्वरांशं सुतं मत्वा सेवमानः स तं भजेत्॥


तत्र स्नेहं हरौ युक्त्वा सहजं परमं व्रजेत्।

षड्रिपून् निगृह्य सम्यक् कर्म सिद्ध्यति निश्चितम्॥

प्रेमशक्ति – अनन्तशक्ति

(प्रेमक्रमेण परमगतिः)

मनुष्यः यः प्रेम करोति स्वपुत्रं च पुत्रिकाम्।

माता-पितरौ बान्धवांश्च  भ्रातरं च तथा सतीं॥


प्रेमभावं स शिक्षेत तेन स्यात् सत्गतिः।

प्रेमभक्तिं करोति यः स लभेत सुमतिम्॥


सुमत्यां जाग्रतायां तु ईश्वरे प्रेम अप्रतिमम्।

ईश्वरे यः प्रेम करोति स लभेत परां गतिम्॥

प्रेमक्रमेण परमगतिः

मनुष्यः यः प्रेम करोति स्वपुत्रं च पुत्रीं,

माता-पितरौ बान्धवं भ्रातरं च सतीम्।


प्रेमभावं स शिक्षेत, तेन स्यात् सत्गतिः।

प्रेमभक्तिं करोति यः स लभेत सुमतिम्।


सुमत्यां जाग्रतायां ईश्वरे प्रेमाप्रतिमम्।

ईश्वरे यः प्रेम करोति स लभेत सद्गतिम्॥

कर्मयोगस्य मूलसिद्धान्तः

सर्वकर्मसु स्वभावतः शुभाशुभे इति द्विविधौ फलौ विद्यमानौ।

शुभाशुभकर्मभ्यां जीवः बध्यते, निष्कामकर्मणा बन्धनात् विमुच्यते।

कर्मयोगिन्, एतत् स्मर-

यस्य कर्मणः अन्ते शुभफलं, तत् कर्म शुभं स्मृतम्।

यस्य कर्मणः अन्ते अशुभफलं, तत् कर्म अशुभं स्मृतम्।

हरेर्मायानिवारणस्य साधनम्।

मनुष्यलोके हरेर्माया व्याप्ता सर्वत्र संस्थिता।

केवलं हरेः कृपादृष्ट्या परिहारः सम्भवः तस्याः॥


मोहिनी सा नयति एनं दुःखसंसारसागरम्।

हरेः स्मरणमात्रेण नश्यति सा स्वप्नसन्निभा॥

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जन्ममृत्युः (सत्यम्–मिथ्या)

(मुक्तछन्दः)

जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं पूर्णतया मिथ्या।

मरणानन्तरं सः जानाति लोकेऽस्मिन् सत्यम्॥


जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं केवलं स्वप्नम्।

मरणानन्तरं तत् भवति जाग्रतावस्थायां स्थितम्॥


तस्मात् जीवने सदा कर्तव्यं सदाचारं च सत्कर्म॥

अन्यथा मरणानन्तरं प्राप्नोति महद्दुःखकष्टम्॥

भक्तिनीतिः

 बाह्या भक्तिर्दुराचारः, अन्तर्भक्तिः सदाचारः।

अन्तर्भक्त्या आत्मशुद्धिः, आत्मशुद्ध्या ईश्वरप्राप्तिः॥

बालगोपालेन ईश्वरलाभः

(मुक्तछन्दः)

मानवो धर्मं कर्म च न जानन्नपि गृहे स्थापयति बालगोपालम्।

चिन्तयन्ति ते,बालगोपालस्य सेवया एव  प्राप्स्यन्तीति परं पदं।


धर्मं वदति वारं वारं,ईश्वरप्राप्तौ प्रथमं शुद्धं मनोऽवश्यकम्।

निष्कामं कर्म,निष्कामो धर्मो,भक्तिर्भक्तसम्मानश्च  प्रयोजनम्॥

बालगोपालेन ईश्वरलाभः

(मुक्तछन्दः)

मानवोऽजानन् धर्मं कर्म च गृहे स्थापयति बालगोपालम्।

चिन्तयन्ति ते, बालगोपालस्य सेवया एव प्राप्स्यन्ति परं पदम्।


धर्मं वदति वारं वारम्, ईश्वरप्राप्तौ शुद्धं मनः प्रथमम् आवश्यकम्।

निष्कामं कर्म, निष्कामो धर्मः,भक्तिः भक्तसम्मानश्च परमं साधनम्॥

भक्त–भगवान्–भावः

भक्तः महाभावग्राही, भगवान् च तथैव सदा।

प्रेमसम्बन्धो महाभावः, स एव तयोः सदा॥

सत्यस्य मौनम् 

(पृथिव्याः यथार्थता)

(मुक्तछन्दः)


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, न कश्चित् सत्यमिच्छति।

सर्वे वक्तुमिच्छन्ति, स्वकथां स्वनाम च॥


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, सर्वे मानगर्विताः।

स्वार्थे मग्नाः जनाः सर्वे, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


आपदि सम्प्राप्तायां तु, सत्यं ज्ञातुमिच्छन्ति।

पूर्वं तु न कश्चिदेव, कदाचन तत्त्वं वेत्ति॥


सर्वे यशःप्रचारेण, स्वनाम विस्तारयन्ति।

सत्यं तु नाङ्गीकुर्वन्ति, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


सत्यं तिष्ठति मौनेन, गर्वेणावृतचेतसाम्।

एषा लोके कठोरेव, पृथिव्याः यथार्थता॥


यः शुद्धात्मा स एवैतत्, जन्मनैव वेत्ति हि।

अन्ये मोहान्धचेतसः, न जानन्ति एव हि॥ 

सत्योपासना

पूजायां नास्ति कालोऽत्र, न घंटानिनदः आवश्यकः।

न मन्त्रजपो न बाह्यकृत्यं, भाव एव ह्यावश्यकः॥


न पश्यति भगवान् द्रव्यं, न हेमावरणभूषणम्।

हृद्गूढभक्तिमेव पश्यति, शुद्धमानसपूजनम्॥

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 ब्रह्मतत्त्वं

ब्रह्मतत्त्वविहीनग्रन्थजीवगुरुवर्णनम्

(ब्रह्मतत्त्वमहिमा)

यस्य ग्रन्थे न विद्यते ब्रह्मतत्त्वं,

तत् शास्त्रं न भवति पूर्णसत्यम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वं,

स जीवः न जानाति पूर्णतत्त्वम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,

स न गुरुः न पण्डितः शास्त्रमतम्॥


यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,

रुद्धमेव भवति तस्य मोक्षद्वारम्॥

अन्नब्रह्मतत्त्वश्लोकः

अन्नं ब्रह्मेति श्रुतिषु सनातनम्,

भोजनं यज्ञरूपमुदाहृतम्॥

शुद्धे मनसि यत्र हि शुद्धमन्नम्,

तत्रैव वसति परं ब्रह्म नित्यम्॥

भक्तरक्षणं धर्मोपदेशः

(मुक्तछन्दः)

शृणुत भक्तजनाः, एतत् सनातनं वचनम्।

भक्तात्मनः विपदि तस्य सह कुरु अवस्थानम्।

सान्त्वनां प्रदेहि सदा, न त्यज एनं एकाकिनम्।

निन्दकदुष्टानां कुरु उचितं प्रत्युत्तरम्।

भक्तात्मनः विपदि तं मा त्यज कदाचन।

ब्रह्मादेशं मन्यस्व, तस्य सदा कुरु पालनम्॥

हरिलीलारहस्यं

हरिः स्वलीलां जानाति, न जानाति हि संसारः।

अनुमानेन सर्वे तां, गायन्ति तस्य गुणगानम्॥


ब्रह्मापि न जानाति, न वेदाः, नापि देहिनः।

अनुमानेन सर्वे तां, गायन्ति तस्य गुणगानम्॥


योगिनोऽपि हि योगेन, चित्ते तां न विलोकयेत्।

मायावरणे स्थिते रूपे, तत्रालोकः कुतः पुनः॥

भक्तभगवतोः इह लीला

भक्तः सदा सहनशीलः सदा सामाजिकः।
भक्तरक्षकः भगवान् न भवति अशास्त्रिकः।

भक्तधर्मरक्षणार्थं करोति असुरसंहारम्।
भगवतः एतत् इह दैवकर्म सदा अनन्तम्॥

शुद्धभक्तिसृजनम्।

निष्कामं स्वतःस्फूर्तं धर्मं कर्म च रक्षति।

एवं सततमुत्तिष्ठन् मनः शुद्धिं प्रयच्छति॥

निष्कामकर्म → मनःशुद्धिः → आत्मशुद्धिः

 → शुद्धभक्तिः → मुक्ति → मोक्षः।

आत्मशुद्धेर्लक्षणम्।

चित्ते दृश्यते गद्गदभावं,

प्रेमाश्रुभिः प्लावितं नयनम्।

हिच्काभिः सहितं रुदनम्,

एतानि आत्मशुद्धेर्लक्षणम्॥

हरिभक्तः।

भक्तो न कामयते पदवीं, न कामयते सम्मानं।

निष्कामप्रेमप्लावितनेत्रः हरिमयः तस्य प्राणः।

न वादो न विवादोऽस्ति, एकान्तमेव तस्य प्रियम्।

न शिखा न तिलकं तस्य, हरिप्रेमैव तस्य बलम्।

अनन्तो हरिः, अनन्ता हरिकथा,

अनन्तानि शास्त्राणि॥

(मुक्त छंद )

अनन्तो हरिरव्यक्तो लीलाश्चास्यानन्ताः।

शास्त्राण्यप्यनन्तानि कथाश्चास्यानन्ताः॥ 


अनन्तोऽस्य गुणो दिव्यो नास्ति तस्य परिसीमना।

न कश्चिज्जानाति पूर्णं तस्य दिव्यं चरितं नरजनाः॥


नादिर्न चान्तो यस्य प्रभोर्नित्यविभूतिषु।

अनन्तेऽस्मिन् हरेः कीर्तिः प्रवहत्येव मे चेतसि॥


निष्कामकर्मणा नित्यं निष्कामधर्मपालनात्।

लभ्यते स हरिः साक्षान्निष्कामभावनात्॥ 

अध्ययन-प्रचार-अध्यापन

अधिकारनीतिः

(मुक्तछन्दः)

सर्वेऽपि शास्त्रं पठितुं समर्हाः,

न जातिभेदो न च लिङ्गवर्जाः।

न जन्मना कश्चन वर्जनीयः,

सत्यस्य मार्गेऽधिकारयोग्यः॥


यो बोधयेद् अन्यजनं हि सम्यक्,

तस्यास्ति ज्ञानं यदि सुसम्यक्।

अज्ञानयुक्ता कथिता हि वाचः,

नयन्ति लोकान् विपथं भ्रंशम्॥


तस्मात् सनातनधर्मोऽयं ब्रूते,

न सर्व एवोपदिशन्ति शास्त्रे।

येषां तु ज्ञानं विशदं विमुक्तं,

ते एव लोकाय प्रदिशन्ति मार्गम्॥

शास्त्रार्थबोधयोग्यता

शास्त्रार्थबोधाय विवेकयुक्ता

सूक्ष्मा बुद्धिर्विज्ञानयुक्ता ।

युक्तिप्रधाना प्रबुद्धा बुद्धिः

तद्विना न सिद्ध्येत् गूढार्थगतिः॥

शास्त्राध्ययननीति।

गुरुपादाम्बुजयोगेन शास्त्रमध्येत न संशयः।

यथा प्रदीप्तदीपः तमो नाशयति तत्त्वतः॥

निहत्य मोहजालं गुरुः सत्यं तत्र न संशयः।

शास्त्रार्थसमीक्षया तेन मोक्षमार्गः प्रसस्तय॥

भगवदवतारवर्णनम्

भगवतोऽवतारा बहुधा प्रकीर्तिताः,

धर्मसंस्थापनार्थं लोकेऽवतारिताः॥

तेषां तत्त्वरहस्यं गूढं न सुलभं बोधितुम्,

भक्त्या तु दिव्यतत्त्वं हृदि स्फुरति नित्यम्॥


चतुर्व्यूहेषु रूपेषु वासुदेवः परः स्मृतः,

संकर्षणः प्रद्युम्नोऽनिरुद्धश्च अंशावताराः॥

एते हि व्यूहभेदाः दिव्यरूपप्रकाशकाः,

भगवतः स्वरूपस्य भिन्नांशाः प्रकाशकाः॥

तेषामप्यंशरूपाणि लोके विभान्ति नित्यम्,

तानि भगवतः शक्त्या विश्वं बिभ्रति सततम्॥


अन्ये तु गुणावतारा जगति विख्याताः,

सत्त्वादिगुणभेदेन रूपाणि विभ्रताः॥

तेषामपि स्वरूपाणि लोके विभान्ति हि,

लीलया भगवान् विश्वं नित्यं बिभर्ति हि॥

भगवत्प्रसन्नता

(मुक्तछन्दः)

यः भक्तः स्तौति भगवतः चतुर्व्यूहरूपम्,

तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा अत्यन्तम्॥


यः भक्तः स्तौति पार्श्वदेवतानां समरूपम्,

तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा सर्वाधिकम्॥


एतदेव हि परमं सत्यं नित्यम्,

सर्वयुगेषु सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्॥

सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्=सर्व+ कालेषु + अपरिवर्तनीयम्

अवतारागमन-प्रस्थानस्य गूढत्वम्।

जगन्नाथ एव स्वकं जानात्यवतारसमागतम्।

मर्त्यलोकात् प्रस्थानं तस्यैवास्ति सुबोधितम्॥


न ब्रह्मा न च वेदाश्च न देवासुरमानवाः।

केवलमनुमानेन महिमा तस्य अनुभव्यते॥

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साधुः सन्तः संन्यासी योगी

यः धर्ममार्गानुगतः साधनानिष्ठः  स एव साधुः।

यः सत्यनिष्ठः भगवत्स्मरणपरायणः स एव सन्तः।

यः कर्मफलत्यागी धर्मनिष्ठः  स एव संन्यासी।

यः स्वात्मानं परमात्मनि योजयति स एव योगी।

धर्मफलन्यायनीतिः

यत् धर्मः तत् फलम्-एषा श्रेष्ठा नीति:।

अधिकफलाभिलाष एव महादुर्नीति:।

यथाकर्म तथाफलं, तस्माद्भोगः प्रजायते।

भुक्ते फले क्षये जाते, सर्वं शून्यं प्रपद्यते॥

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धर्मतत्त्व

धर्मः सत्यं च महाव्यवस्थितिः।

संसारमार्गे सततं सः गतिः॥


नित्यः स्वयं सिद्धः सुशुद्धनिर्मलः।

रूपं विवर्त्यापि न मुञ्चति मूलम्॥


युगे युगे सत्त्वमयः गुणात्मा।

सत्ये स्थितो धर्म एव हि ब्रह्म॥


तस्मात् सतां जीवनमार्गदर्शी।

धर्मः सनातनः मोक्षप्रदर्शी॥

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धर्मतत्त्ववर्णनम्

यदा कश्चिद् धर्मो नित्यसारं विहाय ।

तदा स केवलं लोके उत्सवार्थं भवत्येव ॥ 


ततः जनाः सत्यपथाद् दूरं प्रयान्ति ।

काले गते तु ते सर्वे प्रवाहे विनश्यन्ति ॥


तस्मात् सम्यग्धर्मपथं सर्वदा सेवनीयम् ।

येन आत्मा स्वाभिलषितं धाम पुनः प्रापनीयम् ॥

सम्यग्धर्मपथं=सम्यक् धर्मपथम्

धर्म-अधर्म-निर्णयः

(मुक्तछन्दः)

ईश्वरसम्मतं यच्च शास्त्रसम्मतमेव च।

न्याययुक्तं हितकरं स एव कथ्यते धर्मः॥


ईश्वरविरुद्धं यच्च शास्त्रविरुद्धमेव च।

अन्याययुक्तमहितं स एव अधर्मः स्मृतः॥


धर्मस्य सहचरः सत्यः, अधर्मस्य सहचरी मिथ्या।

धर्मस्य सहचरः संस्कारः, अधर्मस्य तु कुसंस्कारः॥


धर्मस्य सहचरी विद्या, अधर्मस्य तु अविद्या।

धर्मस्य सहचरः रिपुजयः, अधर्मस्य तु षड्रिपवः॥


सत्ये स्थितो सदा धर्मः, मिथ्यायां स्थितोऽधर्मः॥

सनातनधर्मशास्त्रेषु एतत् सत्यं प्रकीर्त्यते बारम्बारम्॥

सत्यधर्मलक्षणम्।

स धर्मः परिगण्यः स्यात् यत्र सौहृददर्शनम्।

द्वेषहिंसाकामनानां यत्र नास्ति कदाचन॥

आत्मा–देहगृहविचारः

(मुक्तछन्दः)

यदा गृहमिदं जीर्णं न वासायोपपद्यते।

तदा निवासिनस्तस्मात् त्यजन्ति स्वयमेव ते॥


तथा शरीरमेतज्जीर्णं न कर्मण्युपपद्यते।

तदा देहं परित्यज्य जीवोऽन्यत्रोपपद्यते॥


यदा गृहमिदं भग्नं न पुनर्निर्मितुं क्षमम्।

तदा तद् धूलिरूपेण नश्यत्येव निरन्तरम्॥


तथा शरीरमेतद् भग्नं न पुनः स्थापयितुं क्षमम्।

स्वभावादेव विनश्यति चोपगच्छति पञ्चत्वम्॥


न शक्यं तदिदं रूपं पुनरेव उद्जीवितुम्।

न प्राणः पुनरायाति त्यक्ते देहे कथंचन॥


एष धर्मः सनातनः शास्त्रेषु परिकीर्तितः।

देहभेदेऽपि नित्यात्मा याति स्वमार्गेणैव॥


इत्यात्मदेहगृहविचारः समाप्तः॥

एकत्वं दैवतत्त्वस्य

(एकत्वभावः)

नानानाम्ना स एकः, नानामार्गैः स एव हि।

सर्वेषां पथिकानां सः, एकं लक्ष्यं सनातनम्॥ 


कृष्णवेणुनिनादेन विश्वगीतं प्रवर्तते।

अल्लाहस्य इच्छया सर्वं सृष्टिचक्रं प्रवर्तते॥


कृष्णे प्रेम च लीला च, दिव्यभावः प्रकाशते।

ईश्वरे सत्यकृपा च, हृदि नित्यं विराजते॥


नानाभाषासु भेदोऽस्ति, तत्त्वं तु न भिद्यते।

एकं नित्यं सनातनं, नानानाम्ना प्रकीर्त्यते॥


बलभद्रः बलज्ञानैः, मार्गदर्शी सदा स्थितः।

अज्ञानात् पारमागतान् जनान् नयति सत्पन्थाम्॥


ईशुपुत्रे त्यागदृष्ट्या प्रेमकारुण्यदर्शनम्।

दर्शयति सदा लोके विनयस्य महात्म्यम्॥ 


नानामार्गाः समायान्ति, लक्ष्यं तु एकमेव हि।

यथा सूर्यकिरणाः सर्वे, एकस्मात् उद्भवन्ति हि॥


मा कुरुत भेददृष्टिं, मा कुरुत अज्ञानवृत्तिम्।

सर्वे यान्ति परं ज्योतिः, एकमेव सनातनम्॥

भेदभावः

(देवभावः–मनुष्यभावः)

यः शास्त्रवाक्यैः जानाति परमं देवं श्रीजनार्दनम्।

शुद्धचित्तः पश्यति तस्मिन् दिव्यं तस्य सौरभम्॥

अज्ञात्वा तु परं तत्त्वं मनुष्यं मन्यते तम्।

दुर्गन्धं तत्र पश्यत्येषः न पश्यत्यन्यथा समम्॥

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पश्यत्येषः = पश्यति + एषः

पश्यत्यन्यथा = पश्यति + अन्यथा


अहंकारदोषः

(मुक्तछन्दः)

अहंकारो महादोषः, सहिष्णुता परो गुणः।

अहंकारे हता लङ्का, अतिदर्पे पतन्ति नराः॥


मदान्धः पतति सर्वत्र, धर्मेणैव सुखं भवेत्।

विनयेन सदा शान्तिः, धर्मयुक्तः सदा जयति॥

 

सर्वधर्मसमभावः

(मुक्तछन्दः)

सर्वेषां धर्माणां तु तत्त्वमेकमेव,

हृदये हृदये दीप्यते दिव्यं तेजः।


सर्वेषां देवोऽपि एक एव नित्यः,

धर्मरूपेभ्यः सर्वेभ्यः परतः स्थितः॥


धर्मत्यागः तु अज्ञानस्य लक्षणम्,

यदा नात्मा पश्यति स्वान्तर्ज्ञानम्।

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यज्ञोपवीतवर्णनम्

यज्ञोपवीतं त्रिसूत्रात्मकं शुभम्।

प्रत्येकसूत्रं त्रितन्तुमयं स्मृतम्॥

नवतन्तुसमायुतम् एवं परमपवित्रम्।

ब्रह्मग्रन्थियुक्तं हि यज्ञोपवीतम्॥

जीवस्वभावलक्षणम्

यत्र देशे गच्छति जीवः तत्र फलम् अश्नाति।

यत्र देशे वसति स जीवः तद्-देशीयः भवति॥ 


यत्र धर्मे जायते जीवः तमेव धर्मम् आचरति।

एष एव स्वभावोऽस्य जीवस्य नित्यः प्रकीर्तितः॥ 


देशधर्मानुसारं हि चित्तं तस्य प्रवर्तते।

संस्कारैः नियतः जीवः स्वभावेनैव वर्तते॥

स्वभावदोषविचिन्तनम्।

मनसा निश्चितं तादृशानि कर्माणि न करिष्यामि पुनः सदा।

स्वभावात् क्रियते कर्म, मम दोषोऽस्ति कुत्र सदा?

जीवस्वभावदोषः

(मुक्तछन्दः)

जीवः सहजं न इच्छति श्रोतुं सत्यधर्मम्।

जीवने सुखस्याशया करोति धर्मकर्मम्॥


यत्र जातो जीवोऽयं तदेव जगदिच्छति।

तत्रैव मोहान्नित्यं स्वजीवनमवस्थापयति॥


सर्वैरेव पीडितोऽस्मीति मन्यतेऽज्ञानविह्वलः।

परान् सर्वान् विरोधिनः पश्यत्यन्धोऽविवेकबलात्॥


न जानाति पूर्वकर्म स्वजीवनविनिर्मितम्।

न वेत्ति दैवनीतिं तु सर्वलोकनियामिनीम्॥


बान्धवान् स्वजनांश्चैव सर्वस्वमिति मन्यते।

मायाजालेन बद्धः सन् तत्रैव हि निमज्जति॥


विस्मृत्य दिव्यसंदेशं योजनाः कुरुतेऽनिशम्।

संसारार्थे निमग्नोऽयं न पश्यति परं पदम्॥


एष दोषो महान् जीवस्य भ्रमकारकः।

विस्मरत्यात्मनः कर्म सर्वबन्धविनाशकम्॥

जीव-स्वभावः धर्मः।

शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।

स्वभावदोषो जीवस्य महाऽहितकरश्च महाऽमङ्गलम्।


तस्य प्रतिकाराय जीवस्य स्वभावपरिवर्तनं प्रयोजनम्।

तस्मात् सत्सङ्गः सद्गुरुसङ्गश्च परमं प्रयोजनम्।


स्वभावपरिवर्तनं विना सर्वे कर्मधर्माः निष्फलाः।

एवं देवतासङ्गः सत्सङ्गश्च स्वभावदोषेण विफलाः।

भक्तलक्षणश्लोकाः

अचलश्रद्धया युक्तो भक्तो न विचलत्यपि ।

विपत्तौ दुःखसम्पत्तौ तिष्ठत्येव निरन्तरम् ॥ १ ॥


विनयो नित्यसंयुक्तः शुद्धभावसमन्वितः ।

निःस्वार्थप्रेमयुक्तश्च स भक्त इति कीर्त्यते ॥ २ ॥


नित्यं जप्यप्रणिधान-ध्यानपूजारतोऽनिशम् ।

अनुशासनसंपन्नो भक्त इत्यभिधीयते ॥ ३ ॥


ईश्वरैकगतिप्राज्ञः सर्वफलसमर्पकः ।

समदुःखसुखः शान्तः स भक्तोऽस्ति परायणे ॥ ४ ॥


सत्यशीलो दयालुश्च क्षमावान् धैर्यवान् शुचिः ।

हृदये निर्मलो नित्यं स भक्तः परमेश्वरः ॥ ५ ॥


सेवायां हर्षयुक्तश्च दानपुण्यपरायणः ।

जीवहितरतः शाश्वं भक्त इत्युपलभ्यते ॥ ६ ॥


वैराग्ययुक्तचित्तश्च संसारविषयासकः ।

नित्यमात्मरतिः शान्तः स भक्तः परमोत्तमः ॥ ७ ॥


आन्तरिकसुखयुक्तश्च सदा प्रफुल्लमानसः ।

सन्तोषरतिरत्यन्तं भक्त इत्यभिधीयते ॥ ८ ॥

धर्मदुरुपयोग-धर्मदूषणम्

(मुक्तछन्दः)


यः करोति धर्मेण व्यापारं, तस्य जीवनं केवलं असारम्।

यः करोति धर्मेण दर्पं, स तु अज्ञानी मूर्खसमः॥


यः करोति लोकदर्शनार्थं धर्मं, तस्य धर्मः व्यर्थं कर्म।

यः इच्छति धर्मं नियन्तुं, स अज्ञानी एव मूर्खसमः॥


यः वदति धर्मं केवलं वचनेन, नाचरति कर्मणा किञ्चित्।

तस्य वचनं निरर्थकं ज्ञेयं, शुष्कवृक्षफलमिव निश्चितम्॥


यः धर्मनाम्ना करोति हिंसां, स्वार्थ-सिद्ध्यर्थमेव नित्यं।

स अधर्मी धर्मवेषधारी सन् लोकान् मोहयति-एतदेव सत्यं॥


धर्मो न केवलं शास्त्रं, न च केवलं व्रतपूजनम्।

यत्र भक्तिभावः सत्याचारश्च, स एव धर्मः शाश्वतः॥


स्वप्न-अनुभूति-विवेचनम्
शृणुत भक्तगणाः एतद् सनातन वचनम्।
स्वप्नः अनुभूतिश्च द्वयं अनिश्चितदर्शनम्।।
अप्रामाणिके भवति द्वयं महाविध्वंसकम्॥
प्रामाणिके भवति द्वयं परमसुखप्रदम्॥

Hindi Rendering in Metrical Flow
महा-ज्ञानी महा-गुणी, यदि भक्तिहीन सदा।
संसारचक्र बन्धनों में, मुक्तिम् नायति तदा॥
कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागयुक्त कर्मयोगः
निःस्वार्थभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः उत्तमः।
निष्कामभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः परमः॥
कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागेन युक्तं तत् श्रेष्ठमुत्कृष्टम्॥
एतत् सनातनधर्मस्य परमं तत्त्वं युगे युगे प्रकीर्तितम्॥
 सत्यधर्ममहिमा
(व्यक्तिकेन्द्रितभाव)
सत्यं वचनं, सत्यस्य पालनम्।
महान् धर्मः, महान् अर्पणम्।
सत्यपथि सत्ये स्थितिः,
स दुर्लभः, सः निर्मलः॥
सत्यधर्ममहिमा
(तत्त्वप्रधानभाव)
सत्यं वचनं, सत्यस्य पालनम्।
महान् धर्मः, महान् अर्पणम्।
सत्यपथि सत्ये स्थितिः,
तत् दुर्लभं, तत् निर्मलम्॥

मानवगुणचिन्तनम् 

शृणुत भक्तगणाः एतद् सत्यं वचनम्।

न कदापि स्वात्मानं मन्येत महाजनम्।

विनम्रता मौनता च मानवस्य अतिमहद्गुणौ।

एतद् वचनं स्मरणीयं - मा विस्मर कदाचन॥

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ईश्वर-ईश्वरदूतसङ्गसन्निध्यम्।

अल्पायुषि जगद्यात्रायां,मित्रं कश्चिद् भवेद् नरः।

अन्ये दीपशिखावत् स्युः,क्षणेनैव भवन्ति परः॥ 


अजानन्नपि मार्गार्थं,चेतः कम्पितमानसम्।

स्वकर्मणि प्रवर्तामः,न ज्ञातं भाग्यलिखितं समम्॥ 


यदा तत्त्वप्रकाशोऽन्तः,शङ्काच्छायाः प्रधूयते।

तदा प्रसादः शान्त्याख्यः,हृदि पूर्णत्वम् उदयते॥


देवदूताः हिते नित्यं,विदन्ति ध्येयसंस्थितिम्।

तेषां कृपा सुहृत्त्वं च,तमोऽपि नाशयति धृतिम्॥ 


तस्माद् देवेन सह चर,विश्वासं पालय दृढम्।

यः तिष्ठति हरौ नित्यं,स लभेत शाश्वतं सुखम्॥

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चतुर्वेदानां विषयवस्तुः।

सृष्टे रहस्यं विमलं च तत्त्वं,ऋग्वेदवाणी प्रथमे प्रबोधा।

यज्ञक्रमाणां विधानदाता,यजुर्वेद एष मधुरः स्वरात्मा॥

स्तोत्रात्मकः देवस्य गीतैः प्रहवो मनोज्ञः, सामगतो गुणाढ्यः ।

शान्तिप्रदः सौम्यविधिप्रकाशी,वेदश्चतुर्थोऽथर्वणो निरामयः॥

शिशुवेदः।

ऋग्यजुःसामथर्ववेदाः एते सर्वे कर्मज्ञानप्रधानाः।  

चतुर्वेदेभ्यश्च एष शिशुवेदः स्वयं केवलं भावप्रधानः॥


अस्य प्रवक्ता परब्रह्म श्रीजगन्नाथः, श्रोता श्रीबलभद्रः।  

अत्र नास्ति भेदविचारः, भक्तः भगवान् च समानौ॥

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ग्रहणतत्त्वविवेचनम्

छायया छन्नः सूर्यो यथा शास्त्रे प्रकीर्तितः ।

न तत्र क्रियाविधिर्दृष्टो ग्रहणे कर्मणां क्वचित् ॥


न भगवद्गीता-शास्त्रे ग्रहणस्य विशेषो विधिरुच्यते ।

प्रकृतेर्गुणचक्रेऽयं भावो ज्ञेयः समाहितैः ॥


स्नानं जपो दानकर्म मन्त्रौच्चारादिकं तथा ।

न वेद-गीतोक्त-आज्ञास्तु स्मार्ताचारप्रवर्तिताः ॥


समत्वबुद्ध्या कर्तव्यं न भयेन कदाचन ।

प्रकृत्याः क्रियमाणोऽयं नियमो दैवसंश्रितः ॥

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श्रीकृष्णध्यानतत्त्वम्

(मुक्तछन्दः)

कं ध्यायेत् स परं तत्त्वं, यतः सूर्यचन्द्रमसौ।

नास्त्यन्यत्तत्त्वमुत्तुङ्गं, स्वात्मन्येव स संस्थितः॥


नास्त्यन्यो देवो ध्येयः, नान्यत् किञ्चित् परायणम्।

सर्वकारणभूतात्मा, स्वनाम्न्येव विलीयते॥


यथा गीता शास्त्रवरे, आत्मैव सन्निहितः सदा।

तथा भागवतेऽप्युक्तं, स्वात्मन्येवावतिष्ठते॥


निर्गुणं ब्रह्म यत् प्रोक्तं, तदेव स्वप्रकाशकम्।

नान्यत्तत्त्वं न भेदोऽस्ति, स एवैकः हरिः सत्यम्॥


ये तु भिन्नं परं मन्यन्ते, मोहिता अज्ञानवृत्तयः।

न जानन्ति शास्त्रार्थं, नापि बुध्यन्ते तत्त्वसारम्॥

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पापं दया-दण्डः

(मुक्तछन्दः)

अज्ञानेन कृतं पापं दया भवति सदा।

ज्ञानेन कृतं पापं दण्डः निश्चितः तदा॥


सर्वदा कर्मफलं ज्ञात्वा विवेकं सम्पादयेत्।

यद् अज्ञानात् कृतं पापं तत् क्षम्यतामिति स्फुरेत्॥

दयाधर्मनीतिः

(मुक्तछन्दः)

दया हि धर्मस्य मूलं, दया हि सर्वसुखप्रदा।

दया हि मानवत्वस्य भूषणं, दया हि परमा स्मृता॥


दया न केवलं वाक्ये, न केवलं भूषणम्।

कर्मणा सा प्रकटिता भवेत्, तदा धर्मः फलप्रदः॥


नित्यपापिनि चापराधिनि दया ह्यसत्कर्म कथ्यते।

तस्मिन् उचितं दण्डप्रदानं धर्म इति भाष्यते॥

हिंसादमनम्

अहिंसा परमो धर्मो हिंसा महापापम्।

हिंसाया दमनं धर्मः लोककल्याणकारणम्॥

पापनिवारणं श्रेष्ठधर्मः

पापिनः पापनिरोधो धर्म एव आवश्यकः।

पापकर्मणि दण्डदानं धर्मोऽप्यत्र आवश्यकः॥


पापस्य पूर्वबोधनं तद्वारणं च शास्त्रतः।

एष धर्मः परः प्रोक्तः सद्भिः सत्यपरायणैः॥

अधर्म-पापिपोषणदोषः 

(मुक्तछन्दः)

 पापिनं पालनं लोके निश्चयं पापमुच्यते।

 पापिनः संरक्षणं तु महापापं प्रचक्षते॥


 अधर्मस्य पालनं हि  पापं निगद्यते।

 अधर्मप्रोत्साहनं तु घोरं पापं प्रचक्षते॥

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रोगव्याधिः सनातनधर्मः

शृणुत भक्तगणाः एतत् सनातनवचनम्।

सनातनधर्मे रोगकाले वैद्याश्रयणमेव उत्तमं स्मृतम्।

स्वयमेव श्रीरामेण लक्ष्मणस्य चिकित्सार्थं वैद्यसमाह्वानम्।

एष एव सनातनपरम्परायाः वास्तविकः सत्यनियमः॥

स्वप्न-मरण-आत्मतत्त्वम्

(मुक्तछन्दः)

यदा निर्गच्छत्यात्मा देहात् न कश्चिद् वेद तदा।

न कम्पः नापि चिह्नः स्यात् शान्ते देहे स्थिते सदा॥


निशब्दं याति दूरं स यत्र प्राणो न गच्छति।

अदृष्टोऽज्ञातमार्गेण मृत्यु-पन्थानमृच्छति॥


पुनर्यदा प्रविशत्येष देहं मृत्तिकामयं पुनः।

तदा वेदना समुत्पन्ना चेतना जायते निश्चितः॥


स्पन्दते जागरूकं देहं जीवनं स्वं प्रपद्यते।

वेदना सूचयत्येव आत्मनः सन्निधिं ध्रुवम्॥


अतः मूढमिदं मनो न सर्वं सत्यमीक्षते।

स्वप्नमायाविलासेन भ्रान्तिमेव प्रसूयते॥


विवेकेन विचिन्त्यैतत् सत्यं मिथ्यां च भेदय।

क्षणभङ्गुरेऽस्मिन् लोके आत्मयात्रां निरीक्षय॥

भवसागरपारतत्त्वम्

अन्तर्मुख आत्मज्ञानी अतिप्रयोजनम्।

बहिर्मुखता च आसक्तिश्च नित्यम् वर्जनीयम्।

आत्मशुद्धिनिष्कामभक्तिः सह आपेक्ष्यम्।

एतत् सनातनधर्मैकं भवसागरपारतत्त्वम्।

💓

मायां मोहं दुःखं हरति ईश्वरतत्त्वम्।

(मुक्तछन्दः)

चिकित्सकः न निवारयितुं शक्नोति मायां मोहं च दुःखम्।

केवलम् ईश्वरतत्त्वं निवारयितुं शक्नोति मायां मोहं च दुःखम्॥

केवलम् एतत् ईश्वरतत्त्वं संसारस्य एकमात्रं परमं सत्यम्।

यः जानाति एतत् ईश्वरतत्त्वं सः जानाति संसारस्य सत्यम्॥

यः जानाति संसारसत्यं स पश्यति निजानन्दरूपम्॥

जीवप्रार्थना–स्तोत्रम्।

अहं जीवात्मा सदा, बन्धनेषु निरन्तरम् ।

मायाजालविमूढोऽयं, नाथ! मोहितमानसः ॥


ये मे पूर्वजधर्मिष्ठाः, सखायो ये स्मरन्ति माम् ।

ते तव भक्ताः पूर्वं स्युर्नाथ! तेषां हितं कुरु ॥


तस्मात् कृपां प्रदद्याः त्वं, तेषां मार्गं प्रशोभय ।

कल्याणवृत्तिं नितरां, कुरु तत्र प्रसादतः ॥


अस्मिन् जन्मनि ये भक्ताः, धर्ममार्गनिवर्तिनः ।

तेषां चापि मम नाथ, मङ्गलं साधय प्रभो ॥


अज्ञानं मम नाशय त्वं, ज्ञानभक्ती च देहि मे ।

सत्कर्मशक्तिं देहि च, कृपां कुरु मयि प्रभो ॥


भक्तवाञ्छितकल्पद्रुमः, करुणासिन्धुरदयामयः ।

नमस्ते परमेशान त्रैलोक्यनाथ नमोऽस्तु ते ॥

भक्त का विश्वास।

भगवान सदा मंगल करें, यह भक्त का विश्वास।

सुख मिले या दुःख मिले, यही कहे बारंबार॥


जो भी दे वह कृपा माने, नहीं करे परिहास,

श्रद्धा-भक्ति रखे दृढ़, करे सच्चा उपवास॥


चाहे फूल बिछें पथ में, या आए कंटक-त्रास,

हर हाल में देखे वही, ईश्वर का प्रकाश॥


नयन भले नम हो कभी, पर मन न हो निराश,

क्योंकि हर एक अनुभव में, होती प्रभु की आश॥


सत्य, धर्म, सहनशीलता , यही हो जीवन-श्वास,

ऐसा जो मन बन सके, वही हो सच्चा दास॥

💓

गृहदेवालयनियमः  

सम्पूर्णे गृहे विधिना गृहप्रवेशः शुभप्रदः ।  

असम्पूर्णे न कर्तव्यो कर्मारम्भः कदाचन ॥

  

वास्तुशास्त्रोक्तमुहूर्तं लोकाचारैश्च सम्मतम् ।  

एष सनातनः धर्मः लोकाचारेषु वर्णितः ॥ 

 

सम्पूर्णे देवमन्दिरे देवप्रतिष्ठा विधीयते ।  

नासम्पूर्णे न कार्या प्राणप्रतिष्ठा सिद्धमते ॥ 

 

देवस्थानस्य सिद्धौ तु सर्वकर्म समाचरेत् ।  

एष नित्यः सनातनधर्मस्य नियमः स्मृतः ॥ 

 

वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।  

एतत् चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम् ॥

💓

पीठनिर्माणसिद्धिः

(पीठनिर्माणविधिः)

शास्त्राधारे पवित्रे भूमौ विधिपूर्वं प्रतिष्ठितम् ।

अधिकारिगुरुणा सार्धं परम्परया सुपोषितम् ॥ 


नित्यआराधनसंयुक्तं सदाचारसमन्वितम् ।

लोकसंग्रहकार्येण शिष्यपरम्परान्वितम् ॥ 


न केवलं क्रियामात्रात् पीठं सिद्धिमवाप्नुयात् ।

तपोधर्मसमायुक्तं सत्येनैव विराजयेत् ॥

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देवालयध्वजारोहणनियमः

(देवालयध्वजारोहणविधिः)

ध्वजारोहणकर्मैतत् सनातनधर्मसंमतम् ।

देवालयस्य शोभार्थं विजयस्य च सूचकम् ॥ 


संस्थापिते च देवेशे नारोहेद् देवमन्दिरम् ।

न सञ्चरेत्ततो भक्तः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥


कर्मार्थे यदि गन्तव्यं बहिर्नीत्वा विग्रहम् ।

शुद्धिं कृत्वा विधानेन पुनः स्थापयेत् विग्रहम् ॥


एष धर्मः परो ज्ञेयः शास्त्रसम्मतसंस्थितः ।

मर्यादारक्षणार्थाय सर्वलोकहितस्थितः ॥ 

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महान्

(मुक्त छन्दः)

यः स्वयम् आत्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।

यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥

भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥

उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥

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पूजा

यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।

सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥

शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः

(मुक्तछन्दः)

शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं च आनन्दवर्धकम्।

अधर्मशोकभीतानां, तमसां च विनाशकम्॥


शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।

विष्णोः पूजाविधौ पुण्यं पापनाशनम् उत्तमम्॥


न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।

शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥

शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः

(मुक्तछन्दः)

शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं चानन्दवर्धकम्।

अधर्मशोकभीतानां तमसां च विनाशकम्॥


शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।

विष्णुपूजाविधौ पुण्यं पापनाशनमुत्तमम्॥


न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।

शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥

शङ्खनादमहिमा।

(मुक्तछन्दः)

उद्घोषोऽयं शङ्खनादस्य दैविको पुण्यवर्धनः।

नारायणस्य प्रीत्यर्थम् उद्घोषयेत् शङ्खनादम्॥


नास्ति धर्मे स्त्रीपुंसोर्भेदभावः कदाचन।

सर्वे समत्वभावेन कुर्वन्तु शङ्खनादम्॥

चतुर्व्यूह‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः

ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे

तुलसीपवित्रं धीमहि।

तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥

शुद्धस्वरूप‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः

(ब्रह्म-गायत्री-मन्त्रः)

ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे

शुद्धस्वरूपं धीमहि।

तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥


💓

पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्

जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।

परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि प्रथमम्॥


एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।

ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥

अज्ञानिनां मिथ्याप्रचारः
(ब्रह्मतत्त्वे अज्ञानम्)
अज्ञानी मूर्खा न जानन्ति श्रीबलभद्रम्।
श्रीशेषनागं बलभद्रनाम्ना कुर्वन्ति वर्णनम्॥

ते श्रीप्रद्युम्नं च श्रीअनिरुद्धं च न जानन्ति।
महाज्ञानी इति स्वयम् लोके प्रचारयन्ति॥

अज्ञानं ब्रह्मतत्त्वे, अज्ञानं सिद्धियोगशास्त्रे।
मिथ्याज्ञानं ते लोकेऽस्मिन् प्रचारयन्ति गुरुरूपे॥
श्रीजगन्नाथतत्त्वप्रकाशः
(मुक्तछन्दः)
एकः ब्रह्म महाप्रभुः श्रीजगन्नाथः जगदीश्वरः॥
सर्वाधिकारः तस्यैव, नान्यः कश्चित् ईश्वरः॥

मा कुरुत अन्यायं, मा कुरुत अनधिकारकर्म।
अनधिकारिणः सर्वे लभन्ते धर्मतः दण्डम्॥

अहङ्कारो न रोचते, न रोचते बलदर्पणम्।
विनयः प्रीतिकर्ता स्यात्, तदेव ईश्वराभिलषितम्॥

सर्वेश्वरं महाप्रभुं श्रीजगन्नाथं भक्तवत्सलम्॥
स्वांशैः सह महाप्रभुः करोति जगतः सञ्चालनम्॥

भक्तानुग्रहकर्ता सः लीलया धृतवान् मनुष्यताम्।
लोकहितार्थम् उद्दिश्य दर्शयति अद्भुतं चरितम्॥
श्रीजगन्नाथ-बलभद्र-शेषनागतत्त्ववर्णनम्
जगन्नाथः परमब्रह्म आदिदेवः सनातनः।
बलभद्रः तस्य अंशः, जगन्नाथप्राणरूपः॥

शेषनागः अनन्तदेवः बलभद्रांशस्वरूपः।
विश्वभारधरणहारः आदिदेवः सनातनः॥
भक्तवत्सलत्वम्
नाहं स्वतन्त्रः अत्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु मे स्थिता प्रीतिः, ते मे सदा प्राणसमाः ॥

अहम् अस्वतन्त्रः नित्यं, भक्तपराधीन एव च।
स्नेहबन्धेन बद्धोऽस्मि, प्रेम्णा परिकर्षितः॥

न मे स्वार्थः कदाचित् स्यात्, भक्तानां तु सुखं मम।
तेषां विनाशे दुःखं मे, तेषां हर्षे सुखं मम॥

यथा जननी पुत्रे स्वप्राणान् अपि अर्पयेत्।
तथाहं स्वात्मानं भक्तजनाय ददाम्यहम्॥
भक्तवत्सल्य-स्तोत्रम् (2)
नाहं स्वतन्त्र एवात्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु स्थिता मम प्रीति, ते मम प्राणसखा परमः॥

ये भक्ताः शरणं यान्ति, तेषां रक्षां करोम्यहम्।
नाहं जहामि तान् भक्तान्, मयि ते नित्यशरणम्॥
💓
महान् 

(मुक्त छन्दः)

यः स्वयमात्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।

यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥


भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥

उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥

कलितत्त्ववर्णनम्

(मुक्तछन्दः)

न कलिः राक्षसो नापि नासुरः सत्ये कथ्यते।

यदा धर्मरक्षकः भगवान् तिरोभवति, न भयं विद्यते॥


तदा ब्रह्मासृष्टेषु भूतेषु स्वेच्छाचारो दुराचारः प्रवर्तन्ते।

भ्रष्टाचार-दुराचार-धर्मग्लानिः सा कलिः कथ्यते॥

कलि नाश तत्त्व

सात्त्विकं अन्नं गृहाण, सत्यं धारय, सत्त्वं धारय।

निष्कामं कर्म नित्यं आचर, सर्वं कर्म हरये अर्पय।


भ्रष्टाचार-स्वेच्छाचारं दुराचार-धर्मग्लानिं न धारय।

सदाचारं संयमाचारं सुचरितं धर्मपालनं संवर्धय।


धर्मं सर्वदा मनसि धारय, हरिं सर्वदा सञ्चिन्तय।

स्वं परिवारं प्रेम कारय, तस्मिन् प्रेम्णि विस्तारय।


एतस्मिन् प्रेम्णि कलिः नश्यति, सत्यधर्मः प्रकाशते।

सदैव धर्मप्रेमस्नेहयुक्तं चित्तं धर्मपथे प्रवर्तते॥

 जीवनतत्त्वम्

(मुक्त छंद )

ईश्वरेण प्रदत्तोऽयं कालमन्त्रः शरीरिणाम्।

अदृश्यो दिव्यवरदः सर्वजीवहिताय सः॥ 


हृदयेषु निहितोऽयं गुह्यदीप इव स्थितः।

स्वयमेव प्रज्वलितव्यः जीवनार्थप्रकाशकः॥ 


केचनैनं प्रयुञ्जते करुणादीपवर्धने।

केचन मोहलोभाभ्यां संसारपथं धावन्ति॥


केचन सन्ति ये लोके तारका इव शोभनाः।

परोपकारनिरताः कुर्वन्ति जीवनं शुभम्॥ 


स्वातन्त्र्यं चयनं चैव एष मन्त्रः प्रदर्शयेत्।

उत्थानाय पतनाय जीवने मार्गदर्शकः॥ 


सर्वेभ्यः प्रददौ देवः कर्ममार्गप्रदर्शकम्।

स्वकर्मणा हि जीवोऽयं स्वगतिं सम्प्रपद्यते॥


यदा तु समाप्तिमेति कालमन्त्रः शरीरिणाम्।

न धनं न च वै मित्रं तदा त्रातुं समर्थकम्॥


मृन्मयं देहमेतत्तु पुनरेव धरां गतम्।

कालः शनैः समाप्नोति जीवनस्य कथामिमाम्॥ 


कर्मसत्यानि बीजानि यानि लोके प्ररोपितम्।

तान्येव शेषतां यान्ति वातवेगेऽपि संस्थितम्॥ 


नाटकमिव जीवनं भूमौ देवेन निर्मितम्।

मन्त्रक्षये समाप्तं स्यात् जीवितस्य नाटकम्॥ 

षड्दोषनाशकनीतिसूक्तयः


१. दारिद्र्यदोषः


(दारिद्र्यदोषः कामनां सृजति अन्यत्र।)

दारिद्र्येण कुलं विनश्यति, दारिद्र्यात् लज्जा विनश्यति।

लज्जानष्टे धर्मो नश्यति, धर्मे नष्टे सर्वं नश्यति॥


२. क्रोधदोषः


क्रोधात् बुद्धिर्विनश्यति, क्रोधात् धैर्यं विनश्यति।

बुद्धिनाशे कार्यनाशः, धैर्ये नष्टे फलं नश्यति॥


३. मोहदोषः


मोहो मूलं सर्वदुःखानां, मोहात् बुद्धिर्विनश्यति।

बुद्धिनाशे विवेको नश्यति, विवेकाभावे पतत्यधः॥

ज्ञानात् तु मोक्षः सिध्यति, तस्मात् ज्ञानं समाश्रयेत्॥


४. अहंकारदोषः


अहंकारे विनयो नश्यति, विनये नष्टे गुणा यान्ति।

गुणहीनः लोके निन्द्यः, त्यक्तो दुःखं सदा लभते॥


५. लोभदोषः


लोभात् क्षीयते धर्मः, लोभो नयति पतनाय।

लोभी न तृप्यति कदाचित्, तृप्तौ परमं सुखम्॥


६. अविद्यादोषः


अविद्यया जायते मोहः, मोहात् नश्यति सत्यम्।

सत्ये नष्टे भवति दुःखं, तद्विनाशाय ज्ञानम्॥

जीवनपाठक्रमः

ये नैव जानन्ति गतिगतिमिमां पूर्वजन्मोत्तरं गतिम्।

मायामोहवशादिह लोके जनाः कुर्वन्ति नित्यं भ्रमम्॥ 


जीवन्नेव यथालसं विचरन्ति मोहबद्धाः नराः।

लोकस्य केवलपाठेन न लभन्ते परां गतिम्॥

 

ये जन्मप्रलयक्रमं न विदिताः पूर्वापरं चान्वयान्।

मायामोहवशादिह प्रविशन्ति नूनं जनो लौकिकः॥ 


ये तत्त्वं पुनरागमनमार्गं मरणमार्गं चाधीतवन्तः।

ते वर्तमानजीवने विवृण्वन्ति मार्गं परं शान्तिम्॥ 


ये तत्त्वं विदितं पुनर्जनिमरणं ज्ञात्वा भवन्ति प्राज्ञाः।

तेऽध्यायन्ति सदात्मविवेकविधयं निःश्रेयसस्यैव॥ 


धर्मः स एव गुणान् प्रभवयति नृणां जीवनपाठक्रमः।

येनैव विविक्तया परगतिर्लभ्यते सान्तरम्॥ 

विवाहनीतिः

(मुक्त छंद)

एकविवाहः श्रेष्ठः स्यात् लोके धर्मपरायणः।

सुखदः शान्तिदः नित्यं जीवनस्य हितावहः॥ 


धर्मरक्षार्थमेवात्र बहुविवाहः कदाचन।

अन्यथा स दुःखदः स्यात् सदा क्लेशवृद्धिकरः॥


एकविवाहे सन्तोषः भार्यापत्यसमन्वितः।

शान्तिः प्रेम च नित्यं स्यात् हृदये सुखवर्धितः॥ 


बहूनामेकगृहस्थे विवादः स्यादनिवारितः।

कलहः क्लेशदः नित्यं जीवनं दुःखवर्धितम्॥ 


तस्मादेकविवाहोऽयं श्रेयस्करः बुधैः स्मृतः।

बहुविवाहो लोकेऽस्मिन् दुःखहेतुः प्रकीर्तितः॥

परस्त्री-कन्यालङ्घनदोषः

परस्त्रीगर्भधारणं महापापप्रदायकम्।

नियोगसंयोगप्रथा भ्रष्टाचारस्य कारणम्॥

कुमार्या सह सङ्गं तत् पापहेतुप्रदायकम्।

सृष्टेः संसारहेतूनां महाअहितकरं ध्रुवम्॥

💓

धर्मपूर्वकं प्रजननम्।

(मुक्तछन्दः)

प्रजननं सर्वभूतानां धर्मः शास्त्रोक्तम् अनुशासनम्।

पोषणसामर्थ्यं मनसि कृत्वा ततः कुर्यात् प्रजननम्॥

💓

योनिस्वयंवरनियमः

(प्रकृतिस्वयंवरसत्यं)

(मुक्तछन्दः)

प्रत्येकस्यां योनौ विद्यते स्वयमेव स्वयंवरसभा।

तत्र स्वयं प्रकाशते, ईश्वरदत्ता योनिप्रभा॥


एष प्रकृतेर्मूलं सत्यं परमः नियमः।

सर्वयुगेषु सर्वकाले सत्यरूपेण विद्यमानः॥


एष धर्मः प्रकृतेर्नित्यः स्वयंसिद्धः सनातनः।

सर्वकालेषु सत्योऽयं, न कदाचिद् विपर्ययः॥

☆☆

संस्कृतज्ञानकाव्यम् - महिमा-तत्त्वम्

महिमा संस्कृतस्य-शब्दब्रह्मस्वरूपिणी।
धर्मशास्त्रस्य रक्षिणी सत्यस्य च प्रकाशिनी॥

तत्त्वं ब्रह्म पुनरुक्तं संस्कृतेऽनन्तसौष्ठवम्।
ध्वन्या सम्पूर्णकाव्येन हृदये शाश्वतं स्थितम्॥

काव्ये स्थितं ज्ञानमिदं न नश्यति कदाचन।
छन्दोबद्धं सुगमं स्मृतौ वहति मानवमानसम्॥

लेख्याभावेऽपि सततं वाणी पथेन गच्छति।
श्रुतिपरम्परया नित्यं तत्त्वदीपो न म्रियते॥

सन्धिना शब्दसंयोगोऽर्थानां सागरायते।
एकत्वेन प्रवहन्त्येव भावाः हृदि विराजन्ते॥

लयतालसमायुक्तं काव्यं हृदयं प्रविशति।
स्वररूपेण सम्पूर्णं ज्ञानं लोके प्रपद्यते॥

विनाशकालेऽपि यदा ग्रन्था भवन्ति नश्यन्ति।
स्मृतिरूपे मन्दिरे तु सत्यवाणी विराजते॥

जीवन्नादः शास्त्ररूपो धारयत्येव तत्त्वतः।
काव्यमेव हि साधनं ज्ञानरक्षणकारणम्॥

संस्कृतं श्रेष्ठभाषा सा सन्धियुक्ता सुसंहतिः।
स्वयंपूर्णा प्रकाशेन शब्दराशिः विराजते॥

हृदयाद् हृदयं याति सुलभं नित्यं ध्रुवम्।
धर्मशास्त्रस्य संरक्षणं सत्यस्य च प्रसारणम्॥
जीवस्य मनसः वचनम्
(जीवमनःकथा)
मुक्तछन्द
अहं जीवो भ्रमन् लोके कर्ममार्गेण चालितः।
न मे जातिर्न मे धर्मो न कुलं नापि निश्चितम्॥

जन्मजन्मान्तरं याति कर्मवायुवशानुगः।
नानारूपधरो जीवो नान्तमस्य गतौ लभेत्॥

कदाचित् मानवो भूत्वा नभः पश्यामि विस्मितः।
कदाचित् पशुरूपेण वृत्त्या तिष्ठामि वञ्चितः॥

पुनर्मानुषतां याति कालचक्रप्रवर्तितः।
नानारूपाणि धारयन् संसारार्णवे वर्तते॥

देशाद् देशं प्रव्रजामि न कश्चित् मे स्थिरं गृहम्।
अयं विश्वपथो दीर्घो न कदापि मम स्वगृहम्॥

कथं ब्रूयामहं गर्वात् “अयं धर्मो ममैकतः”?
यदा जीवाः सहस्रेषु पन्थान् यान्ति नानातः॥

यावत् सत्यं न पश्यामि जन्मबन्धविवर्जितम्।
न मे जातिर्न मे धर्मो न देशो न सुहृदः मम॥
जीवस्य अन्त्यप्रार्थना
(मुक्त छन्द)
मम शक्तिरियं क्षीणा, आशाप्यन्ते समाप्ता।
अन्ते सर्वं विनष्टं मे, नाथ त्वां शरणागतः॥

जन्मऋणं समाप्याहं त्वामहं ह्वये नाथम्।
कोले गृहाण मां दीनं, त्वं करुणामयः प्रभो॥

अस्मिन् लोके न कोऽप्यस्ति सत्यस्नेहपरायणः।
न कश्चिदिह जानाति प्रेम्णो मार्गमनन्तकम्॥

यत्र शुद्धः स्नेहभावो नित्यं मधुरसञ्चितः।
तत्र गन्तुमिहेच्छामि, नाथ त्वां शरणागतः॥

बहुदग्धोऽस्मि दुःखेन, कामजालात् विमुक्तः।
वैराग्येण दग्धचित्तः सर्वसङ्गविवर्जितः॥

बहु रुदितवान् पूर्वं, न शक्नोम्यद्य रोधनम्।
भिन्नहृदयोऽहमेकाकी, नाथ त्वां शरणागतः॥
💓

प्रणामाशिषो नियमः

यः साष्टाङ्गं प्रणमति भक्त्या विनयान्वितः ।

तस्मै दातव्यमाशीर्वादं हृदयेन विशुद्धया ॥


यस्य शक्तिर्वर्तते तु आशीर्वादप्रदायने ।

स प्रयत्नेन दद्यात् तत् धर्ममार्गानुसारतः ॥


यदि शक्तिविहीनोऽपि दातुं न शक्नुयाद् जनः ।

तदा तत्प्रणतिं देवे समर्प्य प्रणतो भवेत् ॥


तस्य क्षेमं च कल्याणं प्रार्थयेत् श्रीहरिं प्रति ।

एष धर्मः सनातनः शाश्वतो नियमो ध्रुवः ॥

The Path of Worship of the Form 

and the Formless God

The Path of the Form and the Formless Divine

(Free Verse)


The Formless-silent, vast, unseen,

Beyond all thought, where none has been.

No color there, no shape, no name,

A boundless, ever-equal flame.


The mind that clings to sound and sight

Finds not its hold in endless Light.

It wanders still, by senses led,

Through paths where fleeting shadows spread.


How shall one grasp the Infinite,

Who knows the world by touch and sight?

The embodied soul, in nature tied,

Seeks something near, not vast and wide.


Thus the saint spoke with gentle art-

“Let form be the bridge for the heart.”

In image pure, in name divine,

The restless mind begins to align.


Through eyes that see, and hands that serve,

Through love that flows with steady nerve,

The finite bows to the Supreme,

And wakes at last from transient dream.


The idol is not stone alone,

But a step toward the Unseen Throne.

From form to formless, path is made,

Where fear dissolves and doubts all fade.


So worship Him in form you know,

Let love within you deeply grow-

For through that form, with heart made still,

You touch the One beyond all will.

As One Sees, So God Appears


When God on earth in human form did stay,

Yet few could see His truth in mortal clay.

Some hearts awoke and knew His form divine,

And felt His presence radiant, pure, sublime.


By His own word, His glory stood revealed,

And faith in Him within their souls was sealed.

They bowed in love, their vision clear and bright,

And sensed His fragrance filled with sacred light.


But others saw a man of common birth,

And mocked His name, unaware of worth.

Their clouded minds, in ignorance confined,

Perceived no grace, no truth their hearts could find.


Thus lives this tale upon the earthly span-

God seen as God, or merely seen as man.

As is the heart, so is the sight we frame:

One finds the truth, another mocks the same.

The sacred Texts

The Right to Read, Preach and Teach


All souls may read the sacred lore,

No caste or creed can bar that door.

No birth, no gender can deny,

The quest for truth that dwells on high.


Yet one who speaks and dares to guide,

Must hold true wisdom deep inside.

For words untrue, by ignorance spread,

Lead many minds by falsehood led.


Thus Sanātan Dharma makes it clear,

Not all who read should always steer;

But those with wisdom, pure and true,

May share the light for all to view.

💓

Wisdom Through Living, Not Reading Alone


Many spend their lives in reading lore,

Yet wisdom seldom reaches to the core.

Pages turn and fleeting knowledge grows,

Yet inner truth remains what few can know.


They chase the words in endless, streams,

 Lose themselves in borrowed dreams.

But borrowed light can never truly stay,

When life’s own trials darken every way.


One who walks through sorrow, loss, and pain,

Who falls, yet rises stronger through the strain,

Learns truths no written page can e’er convey,

And finds within a self-illumined way.


For wisdom lives not bound in ink or page,

Nor locked within the scholar’s gilded cage.

It blooms in hearts courageous, deep, and true,

Trials faced and life experienced through.


So read-but live the truths that you have known,

Let insight grow by seeds your life has sown.

For wisdom’s light begins to rise inside,

When life itself becomes your truest guide.

The Illusion of Righteousness

(The Misguided Righteous)

Free verse

In every faith the teachers say,

“Stand firm with truth, do not betray.”

They speak aloud with earnest might,

To guide the world toward what is right.


Where sins lie hid beneath their creed,

And truth is lost in word and deed.

They preach of paths both pure and wise,

Yet fail to see through veiling lies.


Unknowing minds, yet proud they lead,

Confusing want with righteous deed.

They walk in darkness, claim the light,

And name the false as holy right.


Their followers, with faithful heart,

Accept the whole, not knowing part.

Thus wrong appears in virtue’s guise,

And falsehood shines before their eyes.


O seeker, turn your gaze within,

Where silent truths alone begin.

For right is known when ego dies,

And truth stands bare, free of lies.

From Sin to Salvation

He who leaves the righteous way,

In thought and deed goes far astray.


By repeated wrongs, the path is laid,

It starts in mind, then grows ingrained.


What first appears a fleeting stain,

Becomes a chain of silent pain.


Through true remorse and earnest prayer,

The soul is healed with loving care.


By justice, grace, and truth above,

The sinner rises through divine love.

Language and Righteousness

Language is a tool where thoughts are shared,

To speak with love, with mindful care.

With words and rules, minds find a way,

To show what hearts would wish to say.


Yet righteousness needs no single tongue,

Its truth in every tongue is sung.

In every land, in voices free,

It lives in pure integrity.


No language blocks what’s right and true,

For duty shines in all that’s due.

Actions speak both loud and clear,

Their fruits will follow far and near.


So speak in words or silent stay,

Deeds alone will show the way.

For righteousness and actions prove,

The truth that lives, the life that moves.

The Silence of Truth

In this world, none truly wish to hear,

Nor seek the truth that lies so near.

Each voice rises, eager to proclaim,

Its own story, its own name.


All long to speak, but none to heed,

Lost in pride and selfish need.

Until misfortune strikes the soul,

No one seeks what makes them whole.


In this world, all chase their fame,

Spreading wide their fleeting name.

None here wish to listen-lost in pride;

Truth stands silent, pushed aside.


This is the hard reality of Earth-

Every pure soul knows it from birth.

💓

Dream, Death, Rebirth and the Soul

When silent slips the soul away,

No mortal sense can trace its way.

No tremor stirs the lifeless frame,

No sign appears, none speaks its name.


In subtle vastness moves the soul,

Beyond all breath, beyond control.

Alone it glides from realms divine,

Or led by Yama’s aides through Time.


Along death’s path, by karma shown,

In ways unknown, it journeys on.


But when it takes a form once more,

And enters flesh as done before,

A sudden pain, a conscious start,

Proclaims its presence in the heart.


That touch of life, that stirring flame,

Declares the soul has come again.

Through sense and ache, the truth is shown

The living self is not the bone.


O wandering mind, be not misled

By dreams where fleeting shadows spread.

Not all that seems is truly real;

Discern the truth that pain reveals.


For dreams may weave illusion’s veil,

Yet signs of truth shall still prevail.

Know by that spark, so deep within-

The soul returns, and life begins.

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Yama’s aides=messengers of 

the God of death 

Two Souls
(Free verse)
Two souls dwell within this world,
One seeks truth, one joy and gold.

The wise one knows life beyond death,
He walks the path with steady breath.

He works with care, with virtue in sight,
And earns his fruits beyond this light.

No gold or wealth can cross that shore,
His deeds live after death and evermore.

The ignorant denies the beyond,
To fleeting wealth he grows so fond.

He gathers riches, gold and land,
Yet leaves them all when life does end.

With empty hands, he walks alone,
No seeds are sown, no good is grown.

Thus bound in grief, in pain and chain,
He reaps but loss, again, again.

So learn this truth before life’s end,
The path you choose will surely bend.

The wise finds peace, serene and free,
The ignorant lives bound in misery.

The Meditation of Lord Krishna

Who shall He worship-He, the One,

From whom arise the moon and sun?

No higher truth exists above

He dwells within His Self in love.


He seeks no distant deity,

Nor needs a refuge, none but He;

The source of all, the primal flame,

He rests absorbed in His own Name.


As taught in Bhagavad Gita, clear,

He, the supreme soul, near and dear.

And in Srimad Bhagavatam we see,

He, the Lord-he is the master key.


The formless Brahman, vast, supreme,

Is but His own eternal gleam;

No second truth, no separate key,

He is the one reality.


But those who seek some truth apart

Still wander far from wisdom’s heart;

Not knowing Him nor Shastra’s core,

They miss the One forevermore.

💓

Unity of the Divine

By different names, the One is called,

Through varied paths, yet One for all.

In Krishna’s flute, the cosmos sings,

In Allah’s will, creation springs.


In Krishna, love and Lila shine,

In God, grace and truth divine.

Different tongues, yet truth the same,

One eternal, many a name.


Balabhadra stands in strength and light,

Guiding souls on paths of right.

In Jesus Christ’s sacrifice we see

Love, compassion, and humility.


Paths are many, the goal is One,

Like countless rays from a single sun.

Let not division cloud the sight-

All seek the same eternal Light.

Life and Death (Truth–Illusion)

In this world, life appears so real,

Yet all it holds is but a passing veil.

After death, the soul begins to see

The hidden truth of what was meant to be.


This worldly life-no more than a dream,

A fleeting shadow, not what it may seem.

When death arrives, the soul awakes at last,

Freed from the illusion of the past.


Therefore in life, let righteous actions guide,

With virtue and good deeds held deep inside.

Else after death, one surely must endure

Great pain and sorrow-none can make it pure.


Life is but a play; death reveals the truth

It runs its course here, then dissolves into truth.

💓

The Reality of Life

(Divine Spell of Life)

God grants to every soul a span,

A silent gift, unseen by man.

Within the heart it softly lies,

A hidden flame that never dies.


Some use this spell to spread the light,

And kindle hope in darkest night.

While others wander, lost in chase,

Of fleeting dreams and empty race.


This spell is freedom, this is choice,

Bestowed on all with silent voice.

To shape one's path, to rise or fall,

The Divine entrusts this gift to all.


Yet when the spell draws near its end,

No wealth nor power can defend.

The body turns to dust again,

Released from time and mortal pain.


But deeds of truth, the seeds once sown,

Shall live when earthly breath has flown.

For life’s a sacred role we play,

Till time dissolves the fleeting day.

The Body and the Soul

When the house is worn, unfit to stay,

Its dwellers leave and go away.

So when the body fails its role,

The Self departs-the deathless soul.


When walls are cracked, beyond repair,

The house dissolves in dust and air.

So too the living body, weak or old,

Returns to dust, since it cannot hold.


No hand can shape that form again,

No life returns to mortal frame.


This is the truth the Divine declares-

The Eternal Law that all life shares;

Nothing beyond this stands as right,

All else is shadow, veiled from sight.

Love in Living Moments-Now, Not Later

(Service Before Separation)


The time beyond this life’s unclear,

Next birth may come in days or years.

After death, we offer tears,

Sacred rites with heartfelt prayers


Serve your loved ones while they live,

With all the care your heart can give.

Time once lost returns no more,

Late regrets will wound the core.


When breath departs and soul has flown,

No service then can still be shown.

Empty hands and tearful cries,

Cannot reach the soul that flies.


Kind words spoken, deeds so kind,

Leave a lasting peace behind.

Do not wait for “someday” call,

That day may not come at all.


So act today with love sincere,

Hold your dear ones ever near.

In living moments, truth is clear-

Serve them now, while they are here.

💓

When Religion Forgets Its Eternal Essence
(The Essence of True Religion)

When any religion loses its eternal essence,
It slowly becomes a matter of mere occasions.

The followers drift away from the true way;
And when their ages pass, they are swept away.

Hence,one should follow the path of true religion,
So the soul may return to its desired pavilion.
When Religion Loses Its Sanctity

Just as a river, once deep and wide,
Turns into dust when its streams have died,
So too does faith, when truth departs,
Grow faint and hollow in human hearts.

When it loses divine laws, pure and free,
Its purity fades in silence-none can see.
When form remains but the soul is gone,
Its sacred light no longer shines on.

Rituals linger, but love and devotion fade,
Like shadows cast where light once played.
The words are spoken, the acts are done,
Yet lack the warmth of the inner sun.

For true religion is not mere name,
Nor rigid rule, nor outward claim;
Its life resides in the spirit’s flame,
In truth, in love-forever the same.

When essence lives, it shines so bright,
A guiding force, a path of light;
But drained of soul, it cannot remain-
A lifeless form, an empty frame.
Knowing the Heart of Man
(The Measure of a Man)
In society’s wisdom, passed through time,
We find simple truths in thoughtful rhyme.
To know a person, wise and true,
Observe their words and actions too.

The ideal mind seeks thoughts that rise,
In noble dreams and visions wise.
They speak of truth, of higher aim,
And light within a virtuous flame.

The good will speak of deeds that aid,
Of paths where helping hands are laid.
Their words bring comfort, calm, and cheer,
And guide the lost with vision clear.

The lesser mind in faults will stay,
In others’ flaws they lose their way.
In constant blame their thoughts reside,
With restless tongue and wounded pride.

A person’s worth is clearly shown,
By how they treat the weak, unknown.
The ones beneath, the poor, the small,
Reveal the truth that governs all.

In nature’s care and kindness shown,
Their inner seeds are truly known.
To those in pain or deep distress,
Their acts reveal their tenderness.

A man is judged by friends he keeps,
And righteousness he accepts or leaves.
For company shapes the heart and mind,
And leaves its silent mark behind.

The face reflects the hidden soul,
Its fleeting signs reveal the whole.
In eyes and gestures softly cast,
The inner thoughts are seen at last.

A good man walks with gentle grace,
With compassion shining in his face.
He helps in times of grief and need,
With selfless heart in word and deed.

With due respect to all he gives,
In humble truth he always lives.
To elders, peers, and those below,
His reverence continues to grow.

His mind is calm, his senses still,
He governs anger by his will.
No envy clouds his steady sight,
He walks the path of inner light.

In truth he stands, in honesty clear,
With faithful heart and conscience dear.
No falsehood stains his spoken word,
His voice with purity is heard.

No pride resides within his way,
In modest strength he moves each day.
His virtues shine, yet softly stay,
Like stars that glow without display.

With sincere heart and purpose bright,
He walks in truth, in silent light.
His words and deeds in union stand,
A noble soul in every land.
The Power of Self-Correction
(From Inner Truth to World Peace)

If one beholds one’s faults within,
And strives to cleanse each trace of sin,
With steadfast will and vision true,
All inner storms fade from view.

If society can see its flaws,
And strives to mend its broken laws,
With mindful steps and purpose wise,
Its heavy chains dissolve and die.

If every country knows its flaws,
And walks the path of righteous laws,
Through self-correction, firm and wise,
A nation’s countless troubles die.

If nations see their shadowed ways,
And walk the path of righteous ways,
Through self-correction, pure and kind,
The world’s deep wounds are healed in time.

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